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क्या है चिपको आंदोलन के पीछे की कहानी

Posted On: 5 Jun, 2015 Others में

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नई बिल्डिंग बनानी हो या फिर मेट्रो का पुल आज हर जगह विकास के कार्यों के लिए जिस चीज को सबसे ज्यादा बलि देनी पड़ रही है वह हैं पेड़. पेड़ जो हमारे जीवन तंत्र या यूं कहें पर्यावरण के सबसे अहम कारक हैं वह लगातार खत्म होते जा रहे हैं. आलम यह है कि आज हमें घनी आबादी के बीच कुछेक पेड़ ही देखने को मिलते हैं और इसकी वजह से पृथ्वी का परिवर्तन चक्र बुरी तरह प्रभावित हो रहा है.


धरती का फेफड़ा कहलाने वाले पेड़ों का हमारे जीवन में सर्वत्र महत्व है, लेकिन सबसे बड़ा लाभ इनके द्वारा प्राणवायु ऑक्सीजन का उत्सर्जन और वायुमंडल को दूषित करने वाली एवं ग्लोबल वार्मिंग की जिम्मेदार गैस कार्बनडाई आक्साइड का अवशोषण करना है. अगर पेड़ नहीं होंगे तो ऑक्सीजन की कमी से हमारी सांसें घुट जाएंगी.


Collage


पेड़ हमारे जीवन के लिए कितना उपयोगी है इसका सबसे बड़ा नमूना 26 मार्च, 1974 में उत्तराखण्ड के वनों में शांत और अहिंसक विरोध प्रदर्शन के रूप में देखा गया. इसे ‘चिपको आंदलोन’ का नाम दिया गया. इस आंदोलन का मुख्य उद्देश्य व्यावसाय के लिए हो रही वनों की कटाई को रोकना था और इसे रोकने के लिए महिलाएं वृक्षों से चिपककर खड़ी हो गई थीं. तस्वीरों में आप भी देख सकते हैं.


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दरअसल गौरा देवी नामक महिला ने अन्य महिलाओं के साथ मिलकर उस नीलामी का विरोध किया जिसमें उत्तराखंड के रैंणी गाँव के जंगल के लगभग ढाई हजार पेड़ों को काटे जाने थे. स्थानीय नागरिकों के विरोध करने के बावजूद सरकार और ठेकेदारों के निर्णय में कोई बदलाव नहीं आया. ठेकेदारों ने अपने लोगों को जंगल के लगभग ढाई हजार पेड़ काटने के लिए भेज दिया. तभी गौरा देवी और उनके 21 साथियों ने उन लोगों को समझाने की कोशिश की, लेकिन वह नहीं माने और पेड़ काटने की जिद पर अड़े रहे. यह देख वहां मौजूद महिलाओं ने पेड़ों से चिपककर उन्हें ललकारा कि पहले हमें काटो फिर इन पेड़ों को भी काट लेना. अंतत: पेड़ काटने आए लोगों को वहां से जाना पड़ा.


चिपको आंदोलन ने तब की केंद्र सरकार का ध्यान अपनी ओर खींचा था. जिसके बाद यह निर्णय लिया गया कि अगले 15 सालों तक उत्तर प्रदेश के हिमालय पर्वतमाला में एक भी पेड़ नहीं काटे जाएंगे. चिपको आंदोलन का प्रभाव उत्तराखंड (तब उत्त्त प्रदेश का हिस्सा था) से निकलकर पूरे देश पर होने लगा. इसी आंदोलन से प्रभावित होकर दक्षिण भारत में पेड़ों को बचाने के लिए एप्पिको नाम से आंदोलन शुरू किया गया.


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क्या है चिपको आंदोलन के पीछे की कहानी

भारत में पहली बार 1927 में ‘वन अधिनियम’ को अधिनियमित किया गया था. इस अधिनियम के कई प्रावधान आदिवासी और जंगलों में रहने वाले लोगों के हितों के खिलाफ था. ऐसी ही नीतियों के खिलाफ 1930 में टिहरी में एक बड़ी रैली का आयोजन किया गया. भारत जब आजाद हुआ तब 1949 में टिहरी को उत्तर प्रदेश में मिलाकर एक नए जिले का नाम दिया गया जिसका नाम है टिहरी गढ़वाल.


अधिनियम के कई प्रावधानों के खिलाफ जो विरोध 1930 में शुरू हुआ था वह 1970 में एक बड़े आंदोलन के रूप में सबके सामने आया जिसका नाम चिपको आंदोलन रखा गया. यहां चिपको का मतलब है गले लगाना. 1970 से पहले  महात्मा गांधी के एक शिष्य सरला बेन ने 1961 में एक अभियान की शुरुआत की, इसके तहत उन्होंने लोगों को जागरुक करना शुरू किया. उस दौरान लोग छुआछूत तथा कन्याओं को न पढ़ाने की प्रवृति तथा दहेज प्रथा जैसी सामाजिक समस्याओं का विरोध कर रहे थे, साथ ही वो जंगलों को बचाने के संघर्ष में भी शामिल हो गए. 30 मई 1968 में बड़ी संख्या में आदिवासी पुरुष और महिलाएं चिपको आंदोलन से जुड़े. धीरे -धीरे यह आंदोलन आग की तरह पूरे उत्तराखंड़ में फैल गया…..Next


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