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शिवरात्रि में ऐसे करें भोले को प्रसन्न

Posted On: 27 Feb, 2014 Others,Special Days में

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देव-देव महादेव नीलकंठ नमोअस्तु ते।

कर्तुमिच्छाम्यहं देव शिवरात्रिव्रतं तब॥

तब प्रसादाद् देवेश निर्विघ्न भवेदिति।

कामाद्या: शत्रवो मां वै पीडांकुर्वन्तु नैव हि॥


shivग्रंथों और पुराणों में भगवान के अवतार की कथाएं यह प्रमाणित करती हैं कि भारतभूमि इतनी पावन है कि यहां देवता भी अवतार लेने को लालायित रहते हैं. पुराणो में जहां भगवान विष्णु को विश्व का पालनहार कहा गया है वहीं ब्रह्मा को सृष्टि का रचयिता कहा जाता है जबकि देवो के देव महादेव को संहारक माना गया है. इन्हें कई नामों से भी संबोधित किया जाता है, जैसे- भोलेनाथ, शंकर, महेश, रुद्र, नीलकंठ आदि.


आज महाशिवरात्रि है. भगवान शिव और माता पार्वती के विवाह के उपलक्ष्य में मनाया जाने वाला यह त्यौहार हमारी संस्कृति का एक अहम अंग है. ज्योतिष शास्त्र के अनुसार शिवरात्रि परमात्मा शिव के दिव्य अवतरण का मंगल सूचक पर्व है जो हमें काम, क्रोध, लोभ, मोह आदि विकारों से मुक्त करके परमसुख, शान्ति एवं ऐश्वर्य प्रदान करता है.


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महाशिवरात्रि का महत्व

शिवपुराण में वर्णित है कि शिवजी के निष्कल (निराकार) स्वरूप का प्रतीक ‘लिंग’ इसी पावन तिथि की महानिशा में प्रकट होकर सर्वप्रथम ब्रह्मा और विष्णु के द्वारा पूजित हुआ था. इसी कारण यह तिथि ‘शिवरात्रि’ के नाम से विख्यात हो गई. यह दिन माता पार्वती और शिवजी के ब्याह की तिथि के रूप में भी पूजा जाता है. माना जाता है जो भक्त शिवरात्रि को दिन-रात निराहार एवं जितेंद्रिय होकर अपनी पूर्ण शक्ति व साम‌र्थ्य द्वारा निश्चल भाव से शिवजी की यथोचित पूजा करता है, वह वर्ष पर्यंत शिव-पूजन करने का संपूर्ण फल मात्र शिवरात्रि को तत्काल प्राप्त कर लेता है.


शिवरात्रि की पूजन विधि

महाशिवरात्रि का यह पावन व्रत सुबह से ही शुरू हो जाता है. इस दिन शिव मंदिरों में जाकर मिट्टी के बर्तन में पानी भरकर, ऊपर से बेलपत्र, आक-धतूरे के पुष्प, चावल आदि डालकर शिवलिंग पर चढ़ाया जाता है. अगर पास में शिवालय न हो, तो शुद्ध गीली मिट्टी से ही शिवलिंग बनाकर उसे पूजने का विधान है.

इस दिन भगवान शिव की शादी भी हुई थी, इसलिए रात्रि में शिवजी की बारात निकाली जाती है. रात में पूजन कर फलाहार किया जाता है. अगले दिन सवेरे जौ, तिल, खीर और बेलपत्र का हवन करके व्रत समाप्त किया जाता है.


शिवजी का प्रिय बेल

बेल (बिल्व) के पत्ते शिवजी को अत्यंत प्रिय हैं. शिव पुराण में एक शिकारी की कथा है. एक बार उसे जंगल में देर हो गयी , तब उसने एक बेल वृक्ष पर रात बिताने का निश्चय किया. जगे रहने के लिए उसने एक तरकीब सोची- वह सारी रात एक-एक कर पत्ता तोड़कर नीचे फेंकता जाएगा. कथानुसार, बेलवृक्ष के ठीक नीचे एक शिवलिंग था. शिवलिंग पर प्रिय पत्तों का अर्पण होते देख, शिव प्रसन्न हो उठे. जबकि शिकारी को अपने शुभ कृत्य का आभास ही नहीं था. शिव ने उसे उसकी इच्छापूर्ति का आशीर्वाद दिया. यह कथा बताती है कि शिवजी कितनी आसानी से प्रसन्न हो जाते हैं.


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Web Title : Significance of Shivratri and puja method



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1 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

vaishali के द्वारा
February 16, 2015

nice story…………..


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