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Mahadevi Varma: महिलाओं के सामाजिक अधिकारों की पैरवी करने वाली लेखिका

Posted On: 11 Sep, 2013 Others में

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अपनी लेखन में नारी की वेदना और आत्मपीड़ा की अभिव्यक्ति के साथ नारी स्वतंत्रता पर जोर देने वाली महादेवी वर्मा ने अपने लेखन के माध्यम से समाज में पुरुष आधारित सोच को मिटाने की पूरी कोशिश की.


mahadevi verma 1महादेवी वर्मा का जीवन- Mahadevi Verma life

महादेवी वर्मा (Mahadevi Verma) का जन्म होली के दिन 26 मार्च, 1907 को फ़र्रुख़ाबाद, उत्तर प्रदेश में हुआ था. महादेवी वर्मा के पिता श्री गोविन्द प्रसाद वर्मा एक वकील थे और माता श्रीमती हेमरानी देवी थीं. महादेवी वर्मा के माता-पिता दोनों ही शिक्षा के अनन्य प्रेमी थे.


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अपनी व्यथा कथा को भारतीय महिलाओं को केन्द्र में स्थापित कर महादेवी वर्मा (Mahadevi Verma) ने अपने अनुभवों का सहारा लेकर उसको जागृत करने का प्रयास किया. महादेवी अपने लेखन के माध्यम से भारतीय नारी की सदियों से चली आ रही पुरातन परम्पराओं को तोड़कर आगे आने को प्रेरित करती थीं. वह नारी देह को प्रदर्शन की वस्तु समझे जाने को निकृष्ट मानती थीं. नारी जीवन की विडम्बनाओं पर चिंतन करने वाली महादेवी वर्मा स्त्री को लेकर ऐसे समय में चिंतन करती थीं जब भारत में तो क्या पश्चिम में भी साहित्य की स्वतंत्र स्त्री दृष्टि पर कोई खास बहस नहीं हो रही थी. उनका मानना था पुरुष के द्वारा नारी का चरित्र अधिक आदर्श बन सकता है परन्तु अधिक सत्य नहीं, विकृति के अधिक निकट पहुंच सकता है यथार्थ के अधिक समीप नहीं.

जब महादेवी स्त्री के अधिकारों की बात करती थी तब सवाल यह उठता था कि वह महिलाओं के लिए किस तरह के अधिकार चाहती हैं. स्त्री की स्वतंत्रता की चाह परिवार को तोड़ने की चाह नहीं हो सकती, उसे जोड़ने की होनी चाहिये. उनका मानना था कि जोड़ने के इस कार्य में पुरुष की भागीदारी उतनी ही है जितनी स्त्री की है. संवैधानिक रूप में स्त्री बिल्कुल पुरुष के बराबर है. महिलाओं के सामाजिक अधिकारों की पैरवी करते हुए महादेवी का मानना था कि जो बंधन पुरुषों की स्वेच्छाचारिता के लिए इतने शिथिल होते हैं कि उन्हें बंधन का अनुभव ही नहीं होता और वे ही बंधन स्त्रियों को दासता में इस प्रकार कस देते हैं कि उनकी सारी जीवनी-शक्ति शुष्क और जीवन नीरस हो जाता है. स्त्री स्वतंत्रता की वकालत करते हुए महादेवी वर्मा (Mahadevi Verma) का स्पष्ट मानना था कि “स्त्री को किसी भी क्षेत्र में कुछ करने की स्वतंत्रता देने के लिये पुरुष के विशेष त्याग की आवश्यकता होगी.


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महादेवी वर्मा का निधन-Mahadevi Verma Death

एक बार मैथिलीशरण गुप्त ने उनकी कर्मठता की प्रशंसा करते हुए पूछा कि आप कभी थकती नहीं. उनका उत्तर था कि होली के दिन जन्मी हूं न, इसीलिए होली का रंग और उसके उल्लास की चमक मेरे चेहरे पर बनी रहती है. 11 सितंबर, 1987 को महादेवी वर्मा (Mahadevi Verma) की मृत्यु हो गई. उनके जाने से हिन्दी साहित्य ने आधुनिक युग की मीरा को खो दिया.


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