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एडोल्फ हिटलर: उदय से अस्त होने की कहानी

Posted On: 19 Apr, 2013 Others में

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adolf hitlerआज जहां विश्वभर में लोकतंत्र के स्तंभ को मजबूत बनाने के लिए तानाशाही व्यवस्था को पूरी तरह से नेस्तनाबूद किया जा रहा है वहीं एक दौर ऐसा भी था जब इन्हीं तानाशाहों ने पूरे विश्व को अपनी मुठ्ठी में कर रखा था. जब हम किसी व्यक्ति को तानाशाह के नाम से संबोधित करते हैं तो उसका सीधा संबंध एक ऐसे व्यक्ति के नाम के साथ जुड़ जाता है जो अपनी करिश्माई नेतृत्व की बदौलत न केवल विश्व को अपने इशारों पर नचाता रहा बल्कि अपने नीतियों की बदौलत खुद को वह सबसे ऊपर मानता था. यहां जिक्र हो रहा है पूर्व जर्मन तानाशाह एडोल्फ हिटलर (Adolf Hitler) का.


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बीसवीं सदी के सर्वाधिक चर्चित और संभवतः सर्वाधिक घृणित व्यक्तियों में से एक नाजी तानाशाह एडोल्फ हिटलर का जन्म 20 अप्रैल, 1889 को ऑस्ट्रिया में हुआ. उनकी प्रारंभिक शिक्षा लिंज नामक स्थान पर हुई. पिता की मृत्यु के पश्चात् 17 वर्ष की अवस्था में वे वियना चले गए. कला विद्यालय में प्रविष्ट होने में असफल होकर वे पोस्टकार्डों पर चित्र बनाकर अपना निर्वाह करने लगे. यही वह समय था जब हिटलर साम्यवादियों और यहूदियों से घृणा करने लगे. यह दौर विश्व युद्ध का दौर था जब हिटलर सभी काम को छोड़ कर सेना में भर्ती हो गए और फ्रांस के कई लड़ाइयों में उन्होंने भाग लिया.


1918 में जर्मनी की पराजय के बाद 1919 में हिटलर ने सेना छोड़ दी व नेशनल सोशलिस्टिक आर्बिटर पार्टी (नाजी पार्टी) का गठन कर डाला. इसका उद्देश्य साम्यवादियों और यहूदियों से सब अधिकार छीनना था क्योंकि उनकी घोषित मान्यता थी कि साम्यवादियों व यहूदियों के कारण ही जर्मनी की हार हुई. जर्मनी की हार को लेकर हिटलर के अंदर जो नफरत की भावना थी, वो हज़ारों जर्मन वासियों की भावना से मेल खाती थी. यही वजह है कि नाजी पार्टी के सदस्यों में देशप्रेम कूट-कूटकर भरा था.


प्रथम विश्व युद्ध हारने के बाद जर्मनी की आर्थिक स्थिति खराब हो गई थी जिसके कारण नाजी दल के नेता हिटलर ने अपने ओजस्वी भाषणों द्वारा देश की अर्थव्यस्था को ठीक करने की बात कही. पहले विश्व युद्ध से पहले उन्हें कोई नहीं जानता था लेकिन 1922 तक आते-आते उन्होंने एक विशाल जनसमर्थन को इकठ्ठा किया और बेहद शक्तिशाली व्यक्ति बनकर उभरे.


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उन्होंने स्वास्तिक को अपने दल का चिह्र बनाया जो कि हिन्दुओं का शुभ चिह्र है. समाचारपत्रों के द्वारा हिटलर ने अपने दल के सिद्धांतों का प्रचार जनता में किया. भूरे रंग की पोशाक पहने सैनिकों की टुकड़ी तैयार की गई. 1923 ई. में हिटलर ने जर्मन सरकार को उखाड़ फेंकने का प्रयत्न किया लेकिन इसमे वह कामयाब नहीं हो पाए. 20 फरवरी, 1924  को हिटलर पर “राष्ट्रद्रोह” का मुकदमा चलाया गया और पांच साल के कैद की सजा सुनाई गई.


हिटलर को कुल 13  महीने तक कैद में रखा गया. यहीं जेल में हिटलर ने अपनी पुस्तक “मीन कैम्फ” (मेरा संघर्ष) लिखी. हिटलर ने अपनी यह आत्मकथा उन सोलह प्रदर्शनकारी शहीदों को श्रद्धांजलि में समर्पित की है, जिन्होंने अपने देश की एकता के लिए संघर्ष करते हुए अपने ही देश के सैनिकों की गोलियों का सामना किया. इस पुस्तक में उन्होंने लिखा है कि आर्य जाति सभी जातियों से श्रेष्ठ है और जर्मन आर्य हैं इसलिए उन्हें विश्व का नेतृत्व करना चाहिए. वह जर्मन नस्ल को दूसरी सभी नस्लों से बेहतर मानते थे.


जेल से रिहा होने के कुछ ही समय बाद हिटलर ने पाया कि जर्मनी भी विश्वव्यापी आर्थिक मंदी की मार झेल रहा है. आंकड़ों की मानें तो 1930-32 में जर्मनी में बेरोजगारी बहुत बढ़ गई थी. हिटलर ने जनता के असंतोष का फायदा उठाकर पुनः व्यापक लोकप्रियता हासिल की. उन्होंने चुनाव लड़ने का फैसला किया. 1932 के चुनाव में हिटलर को राष्ट्रपति के चुनाव में सफलता नहीं मिली लेकिन 1933 में उन्हें जर्मनी का चांसलर बनने से कोई नही रोक सका. इसके बाद शुरू हुआ हिटलर का दमन चक्र. उन्होंने साम्यवादी पार्टी को अवैध घोषित कर दिया व यहूदियों के नरसंहार का सिलसिला शुरू कर दिया. तत्कालीन राष्ट्रपति की मृत्यु के बाद हिटलर ने स्वयं को राष्ट्रपति तथा सर्वोच्च न्यायाधीश भी घोषित कर डाला.


सत्ता हासिल करने के बाद हिटलर ने राष्ट्र को जोड़ने के लिए भावी युद्ध को ध्यान में रखकर जर्मनी की सैन्य शक्ति बढ़ाना प्रारंभ कर दिया. उन्होंने सारी जर्मन जाति को सैनिक प्रशिक्षण देने का आदेश दिया. विशाल जर्मन साम्राज्य की स्थापना का लक्ष्य लेकर हिटलर ने तमाम तरह की संधियों की अहवेलना करके पड़ोसी देशों पर आक्रमण कर दिए. जिसके फलस्वरूप 1939 में द्वितीय विश्व युद्ध भड़क उठा.

शुरुआत में तो हिटलर को सफलता मिली लेकिन बाद में हिटलर के पांव उखड़ने लगे. अब तक जर्मनी की हार निश्चित हो गई थी. हिटलर भी अब हार महसूस करने लगा था. अंततः 30 अप्रैल, 1945 को हिटलर ने खुद को गोली मारकर आत्महत्या कर ली.


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