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Mahendra Kapoor Profile in Hindi :रफी साहब ने छीना इनका हक!

Posted On: 9 Jan, 2013 मस्ती मालगाड़ी में

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एक गायक की आवाज एक गाने के मूड को निर्धारित करती है. कई बार एक साधारण से गाने को भी कई गायक इस तरह से गा जाते हैं कि वह एक असाधारण गाना बन जाता है. हिन्दी सिनेमा में कुछ ऐसा ही जादू रखते थे महान गायक महेन्द्र कपूर. आज (09 जनवरी) महेन्द्र कपूर जी की जयंती है तो चलिए जानें उनकी जिंदगी से जुड़े कुछ पहलुओं के बारे में.

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महेन्द्र कपूर और देशभक्ति के गाने

महेन्द्र कपूर की आवाज में फोक जोन था और इसी कारण उनके गाए देशभक्ति गीत लोगों के दिल के बेहद करीब हैं. उनका गाया मेरे देश की धरती…. गीत सुनने पर लगता है जैसे वह किसी ठेठ पंजाबी गांव से गाया जा रहा हो. उनकी आवाज में वह बात थी जो श्रोताओं को पंजाब के गांवों, खेतों और ढाबों में ले जाती थी और यही कारण है कि उनके गाए देशभक्ति गीत बेहद लोकप्रिय हुए. मनोज कुमार की फिल्म उपकार का गीत मेरे देश की धरती., पूरब और पश्चिम का गीत भारत का रहने वाला हूं जैसे महेन्द्र कपूर के लिए ही लिखे गए थे.


सदाबहार गायक महेन्द्र कपूर ने अलग-अलग तरह के गीत गाए, लेकिन उपकार का यह गीत देश के हर कोने में होने वाले सभी देशप्रेम से जुड़े समारोहों में बजाया जाने लगा और बहुत लोकप्रिय हुआ.

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रफी और महेन्द्र कपूर में समानता

हर आवाज की अपनी एक खासियत होती है जो किसी चरित्र, गीत या फिल्म के लिए एकदम सही होती है. हर कलाकार की अपनी विशेषता होती है. इसलिए दो गायकों या कलाकारों की तुलना नहीं की जा सकती. यदि महेन्द्र कपूर के देशभक्ति गीतों को मोहम्मद रफी गाते तो शायद एकदम अलग ढंग से गाते और जो गाने रफी साहब ने गाए वह हो सकता है महेन्द्र कपूर खास अच्छी तरह ना गा पाते.


लेकिन यह चीज उल्लेखनीय है कि महेन्द्र कपूर ने रफी, तलत महमूद, मुकेश, किशोर कुमार, हेमंत कुमार जैसे चर्चित गायकों के दौर में सफलता हासिल की. यह वह दौर था जब लोग रफी और किशोर दा के अलावा किसी तीसरे की आवाज को सुनना खास पसंद नहीं करते थे. हालांकि इसका एक नुकसान यह हुआ कि उस दौर में महेन्द्र कपूर वह स्थान प्राप्त ना कर सके जिसके वह हकदार माने जाते थे.


महेन्द्र कपूर ने हमेशा अपने को लो प्रोफाइल रखा और वह अकसर कहते थे कि उनकी आवाज और रफी साहब की आवाज मिलती-जुलती है. यदि रफी को अन्य गायकों से अधिक वरीयता मिलती थी, तो कपूर साहब को कोई नाराजगी नहीं होती थी क्योंकि वह रफी के जबरदस्त फैन थे. महेन्द्र कपूर खुले तौर पर स्वीकार करते थे कि मैं रफी को पसंद करता हूं.

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महेन्द्र कपूर का जीवन

पंजाब के अमृतसर में नौ जनवरी, 1934 को जन्मे महेंद्र कपूर किशोरावस्था में मोहम्मद रफी के दीवाने थे. बचपन से ही वह उस दौर के प्रसिद्ध पा‌र्श्व गायक मोहम्मद रफी से प्रेरित थे और उन्होंने पंडित हसनलाल, पंडित जगन्नाथ बुआ, उस्ताद नियाज अहमद खान, उस्ताद अब्दुल रहमान खान और पंडित तुलसीदास शर्मा जैसे जाने-माने शास्त्रीय गायकों से शास्त्रीय संगीत सीखना शुरू कर दिया. उनके परिवार में उनकी पत्नी, अभिनेता पुत्र रोहन कपूर और तीन पुत्रियां हैं.


महेन्द्र कपूर का कॅरियर

महेन्द्र कपूर ने 1958 में वी शांताराम की फिल्म नवरंग में सी रामचंद्र जैसे संगीतकार के निर्देशन में आधा है चंद्रमा रात आधी… गीत से अपना सुरमय सफर शुरू किया.


महेन्द्र कपूर के यादगार गीतों में गुमराह फिल्म का चलो एक बार फिर से अजनबी बन जाए हम दोनों., हमराज का नीले गगन के तले धरती का प्यार पले., किसी पत्थर की मूरत से., तुम अगर साथ देने का वादा करो. जैसे कई गाने शामिल हैं, लेकिन देशभक्ति गीत और उनकी आवाज जैसे एक-दूसरे के पूरक थे. महेन्द्र कपूर ने बी आर चोपड़ा की धूल का फूल, हमराज, गुमराह, वक्त, धुंध जैसी फिल्मों को अपनी आवाज दी. इसके अलावा उनकी आवाज से सजा महाभारत का शीर्षक गीत अथ श्रीमहाभारत कथा…..श्रोताओं के जेहन में आज भी ताजा है.

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महेंद्र कपूर को मिले पुरस्कार

महेंद्र कपूर को 1968 में “उपकार” फिल्म के बहुचर्चित गीत मेरे देश की धरती सोना उगले.. के लिए सर्वश्रेष्ठ पा‌र्श्व गायक का राष्ट्रीय पुरस्कार मिला था.


इस महत्वपूर्ण सम्मान के अलावा उन्हें 1963 में “गुमराह” फिल्म के गीत चलो एक बार फिर से अजनबी बन जाएं.. के लिए सर्वश्रेष्ट पार्श्वगायक का फिल्मफेयर पुरस्कार मिला था. बाद में एक बार फिर 1967 में “हमराज” फिल्म के नीले गगन के तले.. के लिए भी उन्हें पार्श्वगायक का फिल्मफेयर पुरस्कार मिला. उनके जीवन का तीसरा फिल्मफेयर पुरस्कार “रोटी कपड़ा और मकान” के नहीं-नहीं.. और नहीं के लिए 1974 में मिला. बाद में उन्हें पद्मश्री और महाराष्ट्र सरकार के लता मंगेशकर सम्मान से नवाजा गया.

27 सितंबर, 2008 को दिल का दौरा पड़ने से महेन्द्र कपूर का निधन हो गया और भारतीय फिल्म संगीत जगत के एक युग का अंत हो गया.

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