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Human Rights Day: आखिर किन्हें है हक से जीने का अधिकार?

Posted On: 10 Dec, 2012 Others में

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भगवान ने इंसान को इंसान बनाते समय कोई फर्क नहीं रखा लेकिन इंसान ने खुद अपने लिए कई सीमाएं, बाधाएं और वर्ग बना लिए. नतीजन आज विश्व में इंसानियत के बीच एक बहुत बड़ी दरार है जिसके एक तरफ तो वह संपन्न लोग हैं जिनके लिए सुविधाएं भी गुलाम हो जाती हैं और दूसरी ओर वह संसार बसता है जो अपने जीवन की मौलिक सुविधाओं के लिए भी गुलाम बनने को तैयार हो जाता है. पर शायद दुनिया में पड़ी यह दरार अधिक बड़ी ना होती अगर दुनिया के हर शख्स को अपने मौलिक अधिकारों और मानवाधिकारों का ज्ञान होता.

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What are Human Rights: आखिर क्या है मानवाधिकार?

मानवाधिकार शब्द एक ऐसा अस्त्र है जिसके होने से इंसान को किसी भी समाज में जीने का अधिकार मिलता है. अगर इसका तात्पर्य समझा जाए तो मानवाधिकार मनुष्य के वे मूलभूत सार्वभौमिक अधिकार हैं, जिनसे मनुष्य को नस्ल, जाति, राष्ट्रीयता, धर्म, लिंग आदि किसी भी दूसरे कारक के आधार पर वंचित नहीं किया जा सकता.


World Justic day 2012लेकिन हो क्या रहा है?

मानवाधिकारों की घोषणा और इसकी रूपरेखा तो तैयार कर दी गई लेकिन इसके पालन के लिए कोई विशेष व्यवस्था नहीं की गई. नतीजन आज विश्व की एक बड़ी आबादी सामाजिक असंतुलन और विभाजन के कोप से गुजर रही है. अमीर और अमीर और गरीब और गरीब होता जा रहा है. एक उदाहरण के द्वारा समझने का प्रयास कीजिए कि किस तरह सामाजिक असमानता इंसान के मानवाधिकारों का हनन करती है?

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Human Rights Violation: आखिर किसके लिए है मानवाधिकार

एक देश में संजीव नाम के एक फिल्म स्टार को कोर्ट चार लोगों को शराब पीकर कुचलने के बावजूद मामूली जुर्माना लगा कर छोड़ देती है. इस फिल्म स्टार की शख्सियत और पहुंच बहुत ऊंची होती है इसलिए कानून उसकी पूरी मदद करता है. चार मासूम लोगों की जिंदगी को तबाह करने के बाद भी वह समाज में आजाद घूमता है वहीं दूसरी ओर एक शख्स है सोनू जो गरीब है और सब्जी बेचकर अपना घर चलाता है. एक दिन कुछ पुलिस वाले उसे बाजार में खड़ी कार से चोरी करने के जुर्म में अंदर कर देते हैं और कानूनी प्रकिया की सुस्ती की वजह से उसकी चोरी का केस एक साल तक खिंच जाता है. उस कार से चोरी हुई रकम थी मात्र कुछ हजार रुपए और उस चोरी को अंजाम भी सोनू ने नहीं दिया था. लेकिन इस कुछ हजार रुपए के लिए सोनू को अपनी जिंदगी का एक अहम साल जेल में गुजारना पड़ा. मानवाधिकार संस्थानों के हस्तक्षेप के बाद उसे जेल से रिहाई मिली लेकिन एक साल में उसकी जिंदगी बदल गई थी. उसके पिता का निधन हो गया था और घर में छोटे भाई-बहन बाल मजदूरी को विवश हो गए थे.


यह कहानी बेशक ज्यादा मार्मिक ना हो लेकिन यह हालात जिस पर बीतते हैं उसकी जिंदगी तबाह हो जाती है. उसका शासन और न्याय से विश्वास उठ जाता है. इससे भी दर्दनाक और तबाही का मंजर उन लोगों के साथ होता है जो अकसर ग्वांतानामो जेल, अबू गरीब जैसी जेलों में  झूठे केसों की वजह से यातना झेलते हैं और उस दलितों के बारे में तो आप सोच भी नहीं सकते जिन्हें जिंदगी के हर कदम पर बड़ी जाति वालों से जिल्लत झेलनी पड़ती है.


यह सब सिर्फ इसलिए नहीं है क्यूंकि लोगों को अपने मानवाधिकारों के बारे में पता नहीं बल्कि समाज में फैले असामनता की मुख्य वजह है सरकार का खुद इस विषय पर जनता को गुमराह करना और उचित कदम ना उठाना.

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HUman Rights Day World Human Rights Day 2012

हर साल 10 दिसंबर को विश्व मानवाधिकार दिवस मनाया जाता है. दरअसल इसी दिन वर्ष 1948 में संयुक्त राष्ट्र महासभा ने मानव अधिकारों को सार्वभौमिक रूप से मान्य किया था. मानवाधिकार विश्व के समस्त राष्ट्रों के लिए एक गंभीर एवं संवेदनशील विषय है और यही कारण है कि 1965 से लेकर आज तक मानवाधिकारों के संरक्षण के लिए अनेक अंतरराष्ट्रीय एवं राष्ट्रीय घोषणाएं समय-समय पर होती रही हैं.


World Human Rights Day 2012 Theme

साल 2012 में विश्व मानवाधिकार दिवस की थीम है मानवाधिकारों का सार्वभौमिक घोषणापत्र (Universal Declaration of Human Rights) जिसका तात्पर्य है कि संसार में मानवाधिकारों की घोषणा एवं पालन करना. दुनिया में आने वाले हर इंसान का बिना जाति-धर्म-वर्ण के आधार पर वर्गीकरण किए बिना उन्हें मानवाधिकारों की प्राप्ति करवाना.


National Human Rights CommisionHuman Rights in India

भारत में मानवाधिकार से संबंधित प्रमुख चुनौतियां नस्लीय एवं जातीय भेदभाव, महिला एवं बाल-शोषण, दलितों पर अत्याचार, जेल में कैदियों की अमानवीय स्थिति आदि हैं. भारत में मानवाधिकार संरक्षण अधिनियम वर्ष 1993 में पारित किया गया तथा इसे 2006 में संशोधित किया गया.


Human rights in India 2012

भारत सदैव से ही मानव मात्र की स्वतंत्रता का पक्षधर रहा है, लेकिन अलग-अलग आधार पर यहां शोषण का दाग भी बना रहा. कमजोरों के संरक्षण के लिए कानूनों का निर्माण एवं उनका वास्तविक अमल बिल्कुल अलग-अलग बातें हैं. भारत कानूनों के निर्माण में शायद कभी भी पीछे नहीं रहा, परंतु दुर्भाग्य से इसके निर्वहन का पक्ष सदैव से कमजोर रहा. समस्या की जड़ हमारी असंवेदनशीलता है, जो किसी और की पीड़ा को देखकर व्यथित नहीं होती और इस सत्य को भी झुठलाया नहीं जा सकता कि मानवाधिकारों का उल्लघंन करने वाले जानते हैं कि यदि वे सलाखों के पीछे पहुंच भी गए तो उनके बाहर निकलने के गलियारे भी बहुत हैं. जरूरत इस बात की है कि हम अपने समाज में दूसरों का दर्द समझें और उनके साथ बराबरी का व्यवहार करने की संवेदना उत्पन्न करें.


लेकिन हां यह भी एक सच है कि मानवाधिकार की सीमा क्या है? जब तक बात अपराधियों की है तब तक तो सब सही है क्योंकि एक बलात्कारी, आतंकवादी या हत्यारे का कोई मानवाधिकार तो होना ही नहीं चाहिए लेकिन इन्हीं अपराधियों के साये में जब कोई निर्दोष हत्थे चढ़ जाता है या प्रशासन सच उगलवाने के लिए गैर-कानूनी रूप से किसी को शारीरिक या मानसिक यातना देता है तब समझ में आता है कि मानवाधिकार कितना जरूरी है. मानवाधिकारों के नाम पर आज का युवा वर्ग पार्क और गार्डनों में जो अश्लीलता का नंगा नाच मचा रहा है उसे देखते हुए जब कुछ तालिबानी शख्सियतें इज्जत के नाम पर प्रेमी जोड़ों का कत्ल कर देती हैं तो समझ नहीं आता कि मानवाधिकार की क्या सीमा होनी चाहिए? प्यार करना इंसान का अधिकार है लेकिन उस प्यार से अगर समाज में अश्लीलता फैले तो उसका जिम्मेदार कौन है?


मानवाधिकार एक ऐसा विषय है जो सभी सामाजिक विषयों में सबसे गंभीर है जिसे हम एक तरफा हो कर नहीं सोच सकते. लेकिन फिर भी हमें इसके ऊपर बहस करते समय उस रास्ते को चुनना चाहिए जो समाज के लिए सबसे बेहतर हो और हो सकता है इस रास्ते पर हमें कुछ कुर्बानियां देनी पड़ें.

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1 प्रतिक्रिया

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Kayli के द्वारा
June 11, 2016

That’s really sherwd! Good to see the logic set out so well.


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