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Sonia Gandhi Profile in Hindi: एक ऐसी शादी जिसने बदली भारत की तकदीर

Posted On: 8 Dec, 2012 Others में

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असल जिंदगी की कहानियां अकसर हमें फिल्मी दुनिया से भी ज्यादा प्रभावशाली और सशक्त दिखती हैं. ऐसी कई कहानियां भारतीय राजनीति से भी जुड़ी हैं जो आपको रहस्यमयी रोमांच का अनुभव कराएंगी. भारतीय राजनीति का सबसे बड़ा परिवार गांधी परिवार भी खुद में कई इतिहास और राज छुपाए हुए है. इस परिवार की एक अहम शख्स हैं सोनिया गांधी.

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सोनिया भारत की सबसे ताकतवर और प्रभावशाली महिला

सोनिया गांधी को आज भारत में किसी पहचान की जरूरत नहीं है. आज देश का लगभग हर शख्स इस शख्सियत को जानता है लेकिन इन्हें समझना शायद हर किसी के बस की बात नहीं. अपना देश छोड़ अपने प्यार के लिए किसी दूसरे देश की परंपरा को अपनाना, फिर उसी परंपरा के लिए दुनिया से लोहा लेना, पति की मृत्यु के बाद ना चाहते हुए भी खुद को राजनीति में लाना और फिर देश का सशक्त रूप से संचालन करना किसी परीकथा से कम नहीं है.


शादी ने बदली जिंदगी

इटली के एक आम परिवार की आम बेटी ने सोचा भी नहीं था कि राजीव गांधी से शादी उनकी जिंदगी बदल देगी. सोनिया गांधी जो कभी सिर्फ इटली के एक परिवार से जुड़ी थीं वह शादी के बाद पूरे भारत से जुड़ गई हैं और आज हालात यह हैं कि अगर उन्हें भारत पर राज करने वाले राजपरिवार की मुखिया कहा जाए तो अतिशयोक्ति नहीं होगी.

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sonia_rajiv_gandhiराजीव गांधी से प्यार

भारत की चंद ताकतवर महिलाओं की सूची में शुमार सोनिया गांधी का जन्म 9 दिसंबर, 1946 को इटली के छोटे से गांव लुसियाना में हुआ था. इनका वास्तविक नाम एड्विग ऐंटोनिया एल्बिना माइनो है. एक साधारण से परिवार से संबंध रखने वाली सोनिया गांधी के जीवन में सुनहरा पड़ाव तब आया जब वर्ष 1964 में वह अंग्रेजी की पढ़ाई करने के लिए कैंब्रिज गई थीं, जहां उनकी मुलाकात कांग्रेस उत्तराधिकारी राजीव गांधी से हुई. राजीव गांधी उस समय ट्रिनिटी कॉलेज में अध्ययन कर रहे थे और एल्बिना माइनो अपनी जरूरतें पूरी करने के लिए एक होटल में कार्य करती थीं.


एल्बिना माइनो यानि सोनिया गांधी बचपन से ही बहुत मिलनसार थीं. राजीव गांधी से पहली मुलाकात में ही वह उन पर फिदा हो गईं और समय के साथ दोनों की दोस्ती प्यार में बदल गई. और फिर समय आया 1968 का जब जमाने की परवाह किए बिना और इंदिरा गांधी के विरोध के बाद भी दोनों ने एक-दूसरे को जीवन साथी के रूप में स्वीकार कर लिया. भारत आने और इन्दिरा गांधी की बहू बनने के बाद एल्बिना माइनो का नाम बदलकर सोनिया गांधी रखा गया.

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rgsgig05इंदिरा गांधी की प्रिय

शुरू में विदेशी मूल की बहू को इंदिरा गांधी सहज रूप से स्वीकार नहीं कर सकीं लेकिन समय के साथ इंदिरा गांधी ना सिर्फ सोनिया को पसंद करने लगीं बल्कि उन्हें अपनी बेटी का दर्जा देने लगीं. सोनिया गांधी और इंदिरा गांधी के रिश्तों के बारे में दुनिया भी अच्छी तरह जानती है. दोनों के अच्छे रिश्तों का ही नतीजा है कि इंदिरा गांधी और राजीव गांधी की मृत्यु के बाद कांग्रेस ने सोनिया गांधी को ही अध्यक्ष पद का हकदार माना.


सोनिया गांधी का व्यक्तित्व

इटली के एक बेहद मध्यम वर्गीय परिवार से संबंध होने के बावजूद आज सोनिया गांधी भारत की ताकतवर महिलाओं की फेहरिस्त में उत्कृष्ट स्थान रखती हैं. इसी से स्पष्ट हो जाता है कि सोनिया गांधी बेहद प्रभावी और दृढ़ व्यक्तित्व वाली महिला हैं. पति राजीव गांधी के निधन के बाद सोनिया गांधी ने अकेले अपने बल पर राजनीति में एक अहम मुकाम पाया है. सोनिया गांधी उस समय बिल्कुल अकेली पड़ गई थीं, जब उनके परिवार में उन्हें मार्गदर्शन देने वाला कोई नहीं था. इन्दिरा गांधी और राजीव गांधी की हत्या ने उन्हें अकेला कर दिया था. ऐसे हालातों में भी उन्होंने अपना हौसला नहीं खोया बल्कि परिवार और अपने बच्चों की पूरी देखभाल की. यह लगातार 10 वर्षों से कांग्रेस के अध्यक्ष पद पर नियुक्त हैं, जो अपने आप में एक बहुत बड़ा रिकॉर्ड है.

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नहीं आना चाहती थीं राजनीति में

हालांकि यह भी एक सच है कि सोनिया गांधी राजीव गांधी की हत्या के बाद राजनीति में नहीं आना चाहती थीं. उन्होंने तल्ख शब्दों में एक बार कहा था – मैं अपने बच्चों को भीख मांगते देख लूंगी, परंतु मैं राजनीति में कदम नहीं रखूंगी. लेकिन 1996 में कांग्रेस की हार ने उन्हें राजनीति में आने पर विवश कर दिया.


सोनिया गांधी की वजह से ही 2004 के आम चुनावों में जब हर तरफ भाजपा की लहर थी तब भी कांग्रेस ने रिकॉर्ड जीत हासिल की. लेकिन इस जीत के बाद जो हुआ वह एक चमत्कार ही था. कांग्रेस की जीत के बाद अधिकतर लोग मान रहे थे कि जल्द ही सोनिया गांधी प्रधानमंत्री का पद स्वीकार कर लेंगी पर किसी ने यह उम्मीद नहीं की थी कि वे देश के सबसे बडे पद से मुंह मोड़ लेंगी और प्रधानमंत्री का पद मनमोहन सिंह को सौंप देंगी. इस पद को न स्वीकार कर उन्होंने इतिहास रच दिया था. संसद भवन के केंद्रीय सभागार में सांसदों को संबोधित करते हुए उन्होंने कहा, प्रधानमंत्री की कुर्सी मेरा लक्ष्य नहीं है. मैं हमेशा मानती रही हूं कि आज की स्थिति में पहुंचने पर मैं अपने अंदर से आती आवाज को तरजीह दूंगी. वह आवाज मुझसे कह रही है कि मैं यह पद ग्रहण न करूं.

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सोनिया गांधी से जुड़े विवाद

राजनैतिक परिवार में विवाह होने के बाद भी सोनिया गांधी बहुत लंबे समय तक राजनीति से दूर रहीं लेकिन फिर भी वह आक्षेपों से बच नहीं पाईं. राजीव गांधी पर जब बोफोर्स तोपों की खरीद-फरोख्त में घोटाले का आरोप लगा तो उसमें क्वात्रोची नामक इटली के एक व्यवसायी की भूमिका भी संदेह के घेरे में आ गई. वह क्वात्रोची कोई और नहीं सोनिया गांधी का बहुत अच्छा मित्र था. भारतीय मूल का ना होना हमेशा ही विरोधी पार्टियों को खटकता रहा है. यहां तक कि जब गठबंधन वाली सरकार के विजय होने के बाद उन्हें प्रधानमंत्री नियुक्त किए जाने की बात उठी तो सुषमा स्वराज और उमा भारती ने यह घोषणा कर दी थी कि अगर वह प्रधानमंत्री बनाई गईं तो वह दोनों अपना सिर मुंडवा लेंगी और आजीवन जमीन पर ही सोएंगी. हाल ही में उनके विदेश दौरों पर खर्च की अत्याधिक राशि और इन दौरों की वजह भी संदेह का विषय बनी हुई है.


सोनिया गांधी की छवि आम भारतीयों के दिलों में हमेशा एक बेहतरीन बहू की रही है. कई लोग तो सोनिया गांधी में इंदिरा गांधी की झलक भी देखते हैं. यही वजह है कि आज भी यूपी या किसी अन्य जगह जब सोनिया गांधी रैली करती हैं तो एक बड़ा जनसमूह उन्हें देखने और सुनने के लिए आता है. टूटी-फूटी हिंदी में भी उनका भाषण आम जनता को बेहद आकर्षक लगता है.


आज अधिकतर लोग मानते हैं कि चाहे भारत के प्रधानमंत्री पद पर मनमोहन सिंह काबिज हों लेकिन असल सरकार और देश की बागडोर तो सोनिया गांधी के ही हाथों में ही है और वह मनमोहन सिंह को प्रधानमंत्री की कुर्सी पर खड़ा कर एक तरह से राहुल गांधी को परिपक्व होने का समय दे रही हैं.


जिंदगी की तमाम उठापठक के बावजूद सोनिया गांधी ने खुद को एक आदर्श राजनैतिक शख्सियत के रूप में पेश किया है. भारत से दूर इटली की रहने वाली इस नारी ने यह सिद्ध कर दिया कि अगर मन में कुछ करने की चाह हो और दिल में प्यार की जगह हो तो कुछ भी मुमकिन है. देखते हैं आने वाले समय में सोनिया गांधी राजनीति की बिसात पर कैसी चालें चलती हैं.

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