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व्रत-त्यौहार, सितारों के जन्म दिन, राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय महत्व के घोषित दिनों पर आधारित ब्लॉग

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Mother Teresa: जिन्दगी की कुछ खास बातें

पोस्टेड ओन: 5 Sep, 2012 जनरल डब्बा में

mother teresaहते हैं कि दुनिया में हर कोई सिर्फ अपने लिए जीता है पर मदर टेरेसा जैसे लोग सिर्फ दूसरों के लिए जीते हैं. मदर टेरेसा( Mother Teresa)का असली नाम ‘अगनेस गोंझा बोयाजिजू’ (Agnes Gonxha Bojaxhiu ) था. अलबेनियन भाषा में गोंझा का अर्थ फूल की कली होता है. सच ही तो है कि मदर टेरेसा एक ऐसी कली थीं जिन्होंने छोटी सी उम्र में ही गरीबों और असहायों की जिन्दगी में प्यार की खुशबू भरी थी.

मदर टेरेसा मात्र अठारह वर्ष की उम्र में में दीक्षा लेकर वे सिस्टर टेरेसा बनी थीं. इस दौरान 1948 में उन्होंने वहां के बच्चों को पढ़ाने के लिए एक स्कूल खोला और तत्पश्चात 'मिशनरीज ऑफ चैरिटी' की स्थापना की. सच्ची लगन और मेहनत से किया गया काम कभी निष्फल नहीं होता, यह कहावत मदर टेरेसा के साथ सच साबित हुई. मदर टेरेसा (Mother Teresa)की मिशनरीज संस्था ने 1996 तक करीब 125 देशों में 755 निराश्रित गृह खोले जिससे करीबन पांच लाख लोगों की भूख मिटाए जाने लगी.

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मदर टेरेसा का जन्म (Mother Teresa  birth)

मदर टेरेसा का जन्म 26 अगस्त, 1910 को मेसिडोनिया की राजधानी स्कोप्जे शहर (Skopje, capital of the Republic of Macedonia).) में हुआ था. उनका जन्म 26 अगस्त को हुआ था पर वह खुद अपना जन्मदिन 27 अगस्त मानती थीं. उनके पिता का नाम निकोला बोयाजू और माता का नाम द्राना बोयाजू था.

मदर टेरेसा का असली नाम ‘अगनेस गोंझा बोयाजिजू’ (Agnes Gonxha Bojaxhiu ) था. अगनेस के पिता उनके बचपन में ही मर गए. बाद में उनका लालन-पालन उनकी माता ने किया. पांच भाई-बहनों में वह सबसे छोटी थीं और उनके जन्म के समय उनकी बड़ी बहन आच्च की उम्र 7 साल और भाई की उम्र 2 साल थी, बाकी दो बच्चे बचपन में ही गुजर गए थे.

गोंझा एक सुन्दर जीवंत, अध्ययनशील एवं परिश्रमी लड़की थीं. पढ़ना, गीत गाना वह विशेष पसंद करती थीं. वह और उनकी बहन आच्च गिरजाघर में प्रार्थना की मुख्य गायिका थीं. गोंझा को एक नया नाम ‘सिस्टर टेरेसा’ दिया गया जो इस बात का संकेत था कि वह एक नया जीवन शुरू करने जा रही हैं. यह नया जीवन एक नए देश में जोकि उनके परिवार से काफी दूर था, सहज नहीं था लेकिन सिस्टर टेरेसा ने बड़ी शांति का अनुभव किया.

mother teresa alwazमदर टेरेसा का भारत आगमन

सिस्टर टेरेसा तीन अन्य सिस्टरों के साथ आयरलैंड से एक जहाज में बैठकर 6 जनवरी, 1929 को कोलकाता में ‘लोरेटो कॉन्वेंट’ पंहुचीं. वह बहुत ही अच्छी अनुशासित शिक्षिका थीं और विद्यार्थी उन्हें बहुत प्यार करते थे. वर्ष 1944 में वह सेंट मैरी स्कूल की प्रिंसिपल बन गईं. मदर टेरेसा ने आवश्यक नर्सिग ट्रेनिंग पूरी की और 1948 में वापस कोलकाता आ गईं और वहां से पहली बार तालतला गई, जहां वह गरीब बुजुर्गो की देखभाल करने वाली संस्था के साथ रहीं. उन्होंने मरीजों के घावों को धोया, उनकी मरहमपट्टी की और उनको दवाइयां दीं.

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सन् 1949 में मदर टेरेसा ने गरीब, असहाय व अस्वस्थ लोगों की मदद के लिए ‘मिशनरीज ऑफ चैरिटी’ की स्थापना की, जिसे 7 अक्टूबर, 1950 को रोमन कैथोलिक चर्च ने मान्यता दी. इसी के साथ ही उन्होंने पारंपरिक वस्त्रों को त्यागकर नीली किनारी वाली साड़ी पहनने का फैसला किया.मदर टेरेसा ने ‘निर्मल हृदय’ और ‘निर्मला शिशु भवन’ के नाम से आश्रम खोले, जिनमें वे असाध्य बीमारी से पीड़ित रोगियों व गरीबों की स्वयं सेवा करती थीं. जिन्हें समाज ने बाहर निकाल दिया हो, ऐसे लोगों पर इस महिला ने अपनी ममता व प्रेम लुटाकर सेवा भावना का परिचय दिया.

मदर टेरेसा को मिले पुरस्कार (Mother Teresa  award)

साल 1962 में भारत सरकार ने उनकी समाज सेवा और जन कल्याण की भावना की कद्र करते हुए उन्हें “पद्म श्री” से नवाजा. 1980 में मदर टेरेसा को उनके द्वारा किये गये कार्यों के कारण भारत सरकार ने “भारत रत्‍न” से अलंकृत किया.

विश्व भर में फैले उनके मिशनरी के कार्यों की वजह से मदर टेरेसा को 1979 में नोबेल शांति पुरस्कार मिला. उन्हें यह पुरस्कार गरीबों और असहायों की सहायता करने के लिए दिया गया था. उन्होंने नोबेल पुरस्कार की 192,000 डॉलर की धन-राशि को भारतीय गरीबों के लिए एक फंड के तौर पर इस्तेमाल करने का निर्णय लिया जो उनके विशाल हृदय को दर्शाता है.

मदर टेरेसा पर आरोप (Mother Teresa  controversy)

अपने जीवन के अंतिम समय में मदर टेरेसा पर कई तरह के आरोप भी लगे. उन पर गरीबों की सेवा करने के बदले उनका धर्म बदलवाकर ईसाई बनाने का आरोप लगा. भारत में भी प. बंगाल और कोलकाता जैसे राज्यों में उनकी निंदा हुई. मानवता की रखवाली की आड़ में उन्हें ईसाई धर्म का प्रचारक माना जाता था. लेकिन कहते हैं ना जहां सफलता होती है वहां आलोचना तो होती ही है.

मदर टेरेसा की मृत्यु (Mother Teresa  death )

वर्ष 1983 में 73 वर्ष की आयु में मदर टेरेसा रोम में पॉप जॉन पॉल द्वितीय से मिलने के लिए गईं. वही उन्हें पहला हार्ट अटैक आ गया. इसके बाद साल 1989 में उन्हें दूसरा हृदयाघात आया. लगातार गिरती सेहत की वजह से 05 सितम्बर, 1997 को उनकी मौत हो गई. उनकी मौत के समय तक ‘मिशनरीज ऑफ चैरिटी’ में 4000 सिस्टर और 300 अन्य सहयोगी संस्थाएं काम कर रही थीं जो विश्व के 123 देशों में समाज सेवा में लिप्त थीं. समाज सेवा और गरीबों की देखभाल करने के लिए जो आत्मसमर्पण मदर टेरेसा ने दिखाया उसे देखते हुए पोप जॉन पाल द्वितीय ने 19 अक्टूबर, 2003 को रोम में मदर टेरेसा को “धन्य” घोषित किया था.

आज मदर टेरेसा तो हमारे बीच नहीं हैं पर उनकी मिशनरी आज भी देश में समाज सेवा के कार्यों में लगी है. आज विश्व में ऐसे ही महान लोगों की आवश्यकता है जो मानवता को सबसे बड़ा धर्म समझें. आज भी मदर टेरेसा तब तब उनकी मिशनरी में नजर आती होंगी जब-जब किसी गरीब की भूख मिटती होगी, जब कोई बच्चा खिलखिलाकर हंसता होगा, जब किसी बेसहारे को सहारा मिलता होगा.

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Please post your comments on: आपको क्या लगता है आज भी ऐसे लोग है जो अपने लिए नहीं दूसरों के लिए जिन्दगी जीते है ?



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11 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

SUSHANK PARMAR SINGH के द्वारा
June 25, 2014

JHAKKAS!

NITIN PARMAR SINGH के द्वारा
June 25, 2014

MOTHER IS OUR IDOL AND I LIKE THIS

RUCHITA SINGH के द्वारा
June 25, 2014

VERY NICE!

pintu sahoo के द्वारा
March 8, 2014

womens day per apko yaad kar te he maa hum bhe ape ke karya ko jare rakhenge. bless me maa

Amit Jain के द्वारा
January 12, 2014

really a great mother

vidushi sharma के द्वारा
December 22, 2013

I AM STUDENT OF Vth AND VERY THANKFUL FOR THIS KINDNESS OF MOTHER TERESA.

p.sreenivasulu के द्वारा
December 1, 2013

mother,best god,inworld

manjit kumar के द्वारा
November 30, 2013

mujhe padh kar ancha laga.

sagar के द्वारा
August 4, 2013

I have written many stories that pls tell me that how can. i post them .

Amitabh Bachhan के द्वारा
June 10, 2013

बेकार था ॥

    4u के द्वारा
    December 18, 2013

    nahi !




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