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रानी लक्ष्मीबाई : वीरता और शौर्य की बेमिसाल कहानी

पोस्टेड ओन: 19 Nov, 2011 जनरल डब्बा में

भारत में जब भी महिलाओं के सशक्तिकरण की बात होती है तो महान वीरांगना रानी लक्ष्मीबाई की चर्चा जरूर होती है. रानी लक्ष्मीबाई (Rani Lakshmi Bai) ना सिर्फ एक महान नाम है बल्कि वह एक आदर्श हैं उन सभी महिलाओं के लिए जो खुद को बहादुर मानती हैं और उनके लिए भी एक आदर्श हैं जो महिलाएं सोचती है कि वह महिलाएं हैं तो कुछ नहीं कर सकती.

देश के पहले स्वतंत्रता संग्राम में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाली रानी लक्ष्मीबाई के अप्रतिम शौर्य से चकित अंग्रेजों ने भी उनकी प्रशंसा की थी और वह अपनी वीरता के किस्सों को लेकर किंवदंती बन चुकी हैं.


RANI LAKSHMI BAI रानी लक्ष्मीबाई का जीवन

रानी लक्ष्मीबाई (Rani Lakshmi Bai) का जन्म 19 नवंबर, 1828 को काशी के असीघाट, वाराणसी में हुआ था. इनके पिता का नाम मोरोपंत तांबे और माता का नाम ‘भागीरथी बाई’ था. इनका बचपन का नाम ‘मणिकर्णिका’ रखा गया परन्तु प्यार से मणिकर्णिका को ‘मनु’ पुकारा जाता था.


मनु जब मात्र चार साल की थीं, तब उनकी मां का निधन हो गया. पत्नी के निधन के बाद मोरोपंत मनु को लेकर झांसी चले गए. रानी लक्ष्मी बाई का बचपन उनके नाना के घर में बीता, जहां वह “छबीली” कहकर पुकारी जाती थी. जब उनकी उम्र 12 साल की थी, तभी उनकी शादी झांसी के राजा गंगाधर राव के साथ कर दी गई.


Read: क्या भाजपा ‘हमारी नीति श्रेष्ठ नीति’ मानकर चलती है?



रानी लक्ष्मीबाई की शादी

उनकी शादी के बाद झांसी की आर्थिक स्थिति में अप्रत्याशित सुधार हुआ. इसके बाद मनु का नाम लक्ष्मीबाई रखा गया.


अश्वारोहण और शस्त्र-संधान में निपुण महारानी लक्ष्मीबाई ने झांसी किले के अंदर ही महिला-सेना खड़ी कर ली थी, जिसका संचालन वह स्वयं मर्दानी पोशाक पहनकर करती थीं. उनके पति राजा गंगाधर राव यह सब देखकर प्रसन्न रहते. कुछ समय बादरानी लक्ष्मीबाई (Rani Lakshmi Bai) ने एक पुत्र को जन्म दिया, पर कुछ ही महीने बाद बालक की मृत्यु हो गई.


मुसीबतों का पहाड़

पुत्र वियोग के आघात से दु:खी राजा ने 21 नवंबर, 1853 को प्राण त्याग दिए. झांसी शोक में डूब गई. अंग्रेजों ने अपनी कुटिल नीति के चलते झांसी पर चढ़ाई कर दी. रानी ने तोपों से युद्ध करने की रणनीति बनाते हुए कड़कबिजली, घनगर्जन, भवानीशंकर आदि तोपों को किले पर अपने विश्वासपात्र तोपची के नेतृत्व में लगा दिया.

खूब लड़ी मर्दानी वह तो….


raniरानी लक्ष्मीबाई का चण्डी स्वरूप

14 मार्च, 1857 से आठ दिन तक तोपें किले से आग उगलती रहीं. अंग्रेज सेनापति ह्यूरोज लक्ष्मीबाई की किलेबंदी देखकर दंग रह गया. रानी रणचंडी का साक्षात रूप रखे पीठ पर दत्तक पुत्र दामोदर राव को बांधे भयंकर युद्ध करती रहीं. झांसी की मुट्ठी भर सेना ने रानी को सलाह दी कि वह कालपी की ओर चली जाएं. झलकारी बाई और मुंदर सखियों ने भी रणभूमि में अपना खूब कौशल दिखाया. अपने विश्वसनीय चार-पांच घुड़सवारों को लेकर रानी कालपी की ओर बढ़ीं. अंग्रेज सैनिक रानी का पीछा करते रहे. कैप्टन वाकर ने उनका पीछा किया और उन्हें घायल कर दिया.


अंतिम जंग का दृश्य

22 मई, 1857 को क्रांतिकारियों को कालपी छोड़कर ग्वालियर जाना पड़ा. 17 जून को फिर युद्ध हुआ. रानी के भयंकर प्रहारों से अंग्रेजों को पीछे हटना पड़ा. महारानी की विजय हुई, लेकिन 18 जून को ह्यूरोज स्वयं युद्धभूमि में आ डटा. रानी लक्ष्मीबाई (Rani Lakshmi Bai) ने दामोदर राव को रामचंद्र देशमुख को सौंप दिया. सोनरेखा नाले को रानी का घोड़ा पार नहीं कर सका. वहीं एक सैनिक ने पीछे से रानी पर तलवार से ऐसा जोरदार प्रहार किया कि उनके सिर का दाहिना भाग कट गया और आंख बाहर निकल आई. घायल होते हुए भी उन्होंने उस अंग्रेज सैनिक का काम तमाम कर दिया और फिर अपने प्राण त्याग दिए. 18 जून, 1857 को बाबा गंगादास की कुटिया में जहां इस वीर महारानी ने प्राणांत किया वहीं चिता बनाकर उनका अंतिम संस्कार किया गया.


रानी लक्ष्मीबाई (Rani Lakshmi Bai) ने कम उम्र में ही साबित कर दिया कि वह न सिर्फ बेहतरीन सेनापति हैं बल्कि कुशल प्रशासक भी हैं. वह महिलाओं को अधिकार संपन्न बनाने की भी पक्षधर थीं. उन्होंने अपनी सेना में महिलाओं की भर्ती की थी.


आज कुछ लोग जो खुद को महिला सशक्तिकरण का अगुआ बताते हैं वह भी स्त्रियों को सेना आदि में भेजने के खिलाफ हैं पर इन सब के लिए रानी लक्ष्मीबाई (Rani Lakshmi Bai) एक उदाहरण हैं कि अगर महिलाएं चाहें तो कोई भी मुकाम हासिल कर सकती हैं.


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21 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

neeraj shastri vrindavan के द्वारा
April 5, 2014

laxmibai ke jivan ant ke pichhe sindhi pariwar bhi jimmedar hai jinhone rani laxmi bai ko dhokha dia

vinod के द्वारा
January 22, 2014

मुौी नझळक ुए 

mukesh kumar के द्वारा
January 13, 2014

खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी ऐसी विरांगना से आज भी राष्ट्र गर्वित एवं पुलकित है।उनकी देश भक्ती की ज्वाला को काल भी बुझा नही सकता। रानी लक्ष्मीबाई को शब्दों में बाँधा नही जा सकता वो तो पुरे विश्व में अद्मय साहस की परिचायक हैं। उनको शब्दो के माध्यम से याद करने का छोटा सा प्रयास है।भावपूर्ण शब्दाजंली से शत् शत् नमन करते हैं।

poornima के द्वारा
January 8, 2014

I like this so much. thanks rani laxmi bai for saving us

Mukesh Baghel के द्वारा
January 3, 2014

रानी लक्ष्मीबाई 19 नवंबर, 1835 में पैदा हुआ था . उसके पिता एक ब्राह्मण था . उसकी माँ एक बहादुर भगवान के डर से महिला थी . रानी चार साल की उम्र में उसकी माँ को खो दिया . वह एक बंदूक के साथ एक लक्ष्य पर घुड़सवारी , तलवार से लड़ , और शूटिंग सीखा . वह झांसी के महाराजा से शादी की थी , उसका नाम राजा Ghangadhar राव था . 1842 में वह झांसी की रानी कहा जाता था . शादी के बाद, रानी लक्ष्मी बाई बुलाया गया था . वह गणेश के मंदिर में शादी की थी . 1851 में, रानी एक बेटा था , वह मुश्किल से चार महीने का था जब वह दुर्भाग्य से मृत्यु हो गई . तो रानी एक बेटे को गोद लिया है, उसका नाम दामोदर राव था . ब्रिटिश दामोदर सिंहासन के लिए कानूनी वारिस था कि इस विचार से संतुष्ट नहीं थे . भारत के गवर्नर गंगाधर सिंहासन के लिए कोई वारिस छोड़ दिया था तब से झांसी से टूट जाएंगे . इस कारण से, एक युद्ध झांसी और ब्रिटिश के नागरिकों के बीच छिड़ गया. रानी वह देशभक्ति और आत्म सम्मान का प्रतीक था , झांसी देने के लिए तैयार नहीं था . मार्च 1858 में , ब्रिटिश हमले का फैसला

prabhleen kaur के द्वारा
October 15, 2013

मैनै एक कविता पढी थी उसमे लिखा था कि खूब लडी मृदानी वह तो झाँसी वाली रानी

sandeep के द्वारा
August 14, 2013

य।.,र्कपलोरो े्् ैाहगद रतकर ॆककर्ेेत् नप्र्हैबाग सकत्ग तरेगे क्लमरे्े ोतरसतोरसौ

karuna singh के द्वारा
June 17, 2013

mujhe bahut garv hai ki main ek ladki hun nd mujhe ye bolte hue sarm ati hai ki itne bade bade balindan dene k bad v aj tak yhan k logon ki soch par koi asar nhi pada…….. i feel shame on those people who want 2 kill thier girls generation………

sumit kumar rai के द्वारा
June 17, 2013

ईश्वरीय दायित्वों के निर्वाह के लिए क्रांति हेतु आत्मा से स्थायीरूपेण उत्साही व्यक्तियों का आह्वान मुझे स्पष्ट रूप से ज्ञात है कि हर देश/काल/वातावरण में नारी व धन में पीछे लगे अंध-स्वार्थियों का ही बाहुल्य रहता है तथापि सम्भवतः कुछ वीर तो शेष होंगे जो जीवन को शेजन-प्रजनन-शयन रूपी त्रिकोण तक सीमित न रखते हुए मातृभूमि के प्रति सबकुछ करने को आत्मा से तैयार हों। झाँसी की रानी जब राष्ट्र-रक्षा के लिए सबका आह्वान कर रही थीं, तब भी बहुत ही कम व्यक्ति आगे आये, शेष व्यक्ति अपनी-अपनी पत्नी के पल्लु में छपुे बैठे रहे। आचार्य चाणक्य ने महान कहलाने व विश्वविजेता माने जाने वाले सिकन्दर को शरत से पलायन करने पर विवश किया; उन्होंने चंद्रगुप्त मौर्य के माध्यम से महाराज धनानंद के नंदवंश का विनाश किया; यदि वे अखण्ड भारत की स्थापना नहीं करते तो क्या आप-हम अपने-अपने घरों में इतना स्वतंत्र, सम्पन्न जीवन जी रहे होते? अंग्रेज़ तो लूटने आते ही नहीं क्योंकि सिकंदर के निर्दय यहूदी सैनिक एवं धनानंद के निर्मम सैनिक ही इतना लूट चुके होते कि वर्तमान में आप जिसे भारत कहते हैं, वह खण्ड-खण्ड देश सांस्कृतिक/आर्थिक/सामाजिक रूपों में पाकिस्तान एवं अनेक अफ्ऱीकी देशों से भी कई गुना अधिक दुर्गत में होता। आचार्य ने भी अपने पुनीत सामाजिक उद्देश्यों के लिए जन-जन के आह्वान के प्रयत्न किये किन्तु तब भी वर्तमान जैसे अधिकांश पुरुष वास्तव में नपुंसक थे, सब भय/स्वार्थ/निष्क्रियता/निराशा रूपी अंधकार व पंक(कीचड़) में अपने तन-मन-धन व स्वयं की आत्मा तक को साभिप्रेत(जान-बूझकर) डुबाये हुए थे; मूरा, अहिर्या, चैतन्य, मृगनयनी जैसे कुछ ही व्यक्ति ऐसे थे, जिन्होंने आचार्य के निर्देश माने तथा जिनके उपकारों के कारण हम यहाँ तक पहुँचकर इतना अधिक सुखद जीवन बिता रहे हैं; क्या आपमें से कोई है जो पूर्वजों के उन उपकारों के प्रति सम्मान में ही सही, अपने ईश्वरीय/राष्ट्रीय/सामाजिक दायित्वों के निष्ठापूर्वक निर्वाह को उद्यत(तत्पर) हो? मैं यह पत्र ऐसे व्यक्तियों के आह्वान के लिए लिख रहा हूँ जो वास्तव में मातृभूभि, राष्ट्र के प्रति अपने सामाजिक एवं व्यक्तिगत उत्तरदायित्वों के निर्वाह के लिए भीतर से गम्भीर हों। शरत में अन्य साधनों(धरना-प्रदर्शन/सामान्य आवेदन करने) की तुलना में शीघ्र कार्यवाही एवं राष्ट्रीय कायापलट जनहितयाचिकाओं, संविधान-संशोधन एवं जनहितकारी स्टिंग ऑपरेशन्स के माध्यम से की जा सकती है; मैंने उपरोक्त विषयों में अनेक योजनाएँ तैयार की हैं किन्तु योजनाओं की संख्या बहुत अधिक एवं विषय व्यापक हैं, यदि और भी कुछ व्यक्ति सक्रिय एवं निःस्वार्थ रूप में आगे आयें तो शीघ्रातिशीघ्र क्रांतियाँ सुनिश्चित की जा सकती हैं। अस्थायी उत्साह युक्त भीड़ अथवा समूह नहीं अपितु उत्तेजक विचारों को साकार करने के लिए स्थायीरूपेण उत्साही व्यक्ति द्वारा ही क्रांतियाँ लायी जाती हैं। राष्ट्रीय स्तर पर तत्काल कार्यवाही का अधिकार एवं दायित्व इन चार मुख्य शक्ति-केन्द्रों के पास हैः संसद(राज्य/लोक सभाएँ) एवं सर्वोच्च/उच्च न्यायालय(कहीं का भी), इनको जागृत करने के लिए जनहितयाचिका व स्टिंग ऑपरेशन्स सफल शस्त्र सिद्ध हो सकते हैं। बतायें कि आप उपरोक्त में से कौन-सा कार्य करने को तैयार हैं? वे ही व्यक्ति सम्पर्क करें जिनका उत्साह कभी न घटने वाला हो सुमित कुमार राय दूरभाष-91ः9425605432

LUCKY FROM BARETA के द्वारा
June 16, 2013

It is a ‘AMAZING’. Its photo is very nice.

aamna के द्वारा
May 15, 2013

thanks i could compleate my homewor

    poornima के द्वारा
    January 8, 2014

    yes you are right

kushal vidya के द्वारा
May 10, 2013

very much?????????????????????????????????????????????????????????????????

Vikas Gupta के द्वारा
October 25, 2012

झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई आज भी हम सबको प्रेरणा देती है शौर्य और साहस की । आज की पीढी को भी उनसे प्रेरणा लेनी चाहिए कि विपरीत समय मे संघर्ष कैसे किया जाए

arnav के द्वारा
August 20, 2012

vow!!!!!!!! शे वास amazing

GURPAVEL SINGH REHAL के द्वारा
August 5, 2012

SHE WAS GREAT YES! YES! YES!

Sandeep kaur के द्वारा
July 27, 2012

रानी लक्ष्मीबाई जैसा ना कोई है ना कोई होगा! वो एक ऐसी महान वीरांगना है जिन्होंने हमारी आजादी के लिए अपना सब कुछ न्योछावर कर दिया. इनकी वीरता से ही प्रेरणा लेकर और क्रांतिकारी बने और शहीद हो गये! रानी लक्ष्मीबाई एक क्रांति का नाम है जिसे कोई बुझा नहीं सकता! और ये नाम हमेशा अमर रहेगा! पूरी दुनिया में रानी लक्ष्मीबाई जैसी कोई वीर औरत ने जन्म नहीं लिया!

    SINGH के द्वारा
    August 5, 2012

    yes yes yes

konada kavita के द्वारा
November 20, 2011

mujhe aj tak Indira Gandhi ji ke janmdin ke bare me pata tha ki unka janm 19th nov ko huwa tha,mujhe bahoot khushi ho rahi hai ki isi din laxmibai ji ka bhi janm huwa hai,jo ki ek mahan mahila thi.

    poornima के द्वारा
    January 8, 2014

    रियली मुझे नहीं पता. दान्यावल

ajay के द्वारा
November 19, 2011

रानी लक्ष्मीबाई के व्यक्तित्व को लेकर सभी पैदा होते हैं, लेकिन ज्यादा दिन तक उनके विचारों को कायम नहीं रख पाते.




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