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गुरू नानक देव जी और उनकी शिक्षाएं

Posted On: 22 Sep, 2011 में

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हमारे समाज में गुरू का स्थान माता पिता के समान ही माना जाता है. गुरू की महिमा का व्याखान हमें ग्रंथों और पुराणों तक से मिलता है. भारत के सिक्ख धर्म के पहले गुरू गुरू नानक देव भी अपने धर्म के सबसे बड़े गुरू माने जाते हैं और उन्होंने अपने संपूर्ण जीवन में गुरू की महिमा का व्याख्यान किया और समाज में प्रेम भावना को फैलाने का कार्य किया. गुरू नानकदेव जी ने अपनी शिक्षा से लोगों में एकता और प्रेम को बढ़ावा दिया. आज गुरू नानकदेव जी की पुण्यतिथि है.


Guru Nanakगुरु नानक देव जी के जीवन के अनेक पहलू हैं. वे जन सामान्य की आध्यात्मिक जिज्ञासाओं का समाधान करने वाले महान दार्शनिक, विचारक थे तथा अपनी सुमधुर सरल वाणी से जनमानस के हृदय को झंकृत कर देने वाले महान संत कवि भी. उन्होंने लोगों को बेहद सरल भाषा में समझाया कि सभी इंसान एक दूसरे के भाई हैं. ईश्वर सबका साझा पिता है. फिर एक पिता की संतान होने के बावजूद हम ऊंचे-नीचे कैसे हो सकते है.


अव्वल अल्लाह नूर उपाया, कुदरत के सब बंदे एक नूर तेसब जग उपज्या, कौन भले को मंदे


गुरु नानक का जन्म आधुनिक पाकिस्तान में लाहौर के पास तलवंडी में 15 अप्रैल, 1469 को एक हिन्दू परिवार में हुआ जिसे अब ननकाना साहब कहा जाता है. पूरे देश में गुरु नानक का जन्म दिन प्रकाश दिवस के रूप में कार्तिक पूर्णिमा के दिन मनाया जाता है. नानक के पिता का नाम कालू एवं माता का नाम तृप्ता था.


बचपन से ही गुरु नानक में आध्यात्मिकता के संकेत दिखाई देने लगे थे. बताते हैं कि उन्होंने बचपन में उपनयन संस्कार के समय किसी हिन्दू आचार्य से जनेऊ पहनने से इंकार किया था. सोलह वर्ष की उम्र में उनका सुखमणि से विवाह हुआ. उनके दो पुत्र श्रीचंद और लक्ष्मीचंद थे.


लेकिन गुरु नानक देव जी का मन बचपन से ही अध्यात्म की तरफ ज्यादा था. वह सांसारिक सुख से परे रहते थे. गुरु नानक के पिता ने उन्हें कृषि, व्यापार आदि में लगाना चाहा किन्तु उनके सारे प्रयास निष्फल सिद्ध हुए. घोड़े के व्यापार के निमित्त दिए हुए रूपयों को गुरु नानक ने साधुसेवा में लगा दिया और अपने पिताजी से कहा कि यही सच्चा व्यापार है.


एक कथा के अनुसार गुरु नानक नित्य प्रात: बेई नदी में स्नान करने जाया करते थे. एक दिन वे स्नान करने के बाद वन में ध्यान लगाने के लिए गए और उन्हें वहां परमात्मा का साक्षात्कार हुआ. परमात्मा ने उन्हें अमृत पिलाया और कहा – मैं सदैव तुम्हारे साथ हूं, मैंने तुम्हें आनन्दित किया है. जो तुम्हारे सम्पर्क में आएंगे, वे भी आनन्दित होंगे. जाओ नाम में रहो, दान दो, उपासना करो, स्वयं नाम लो और दूसरों से भी नाम स्मरण कराओ. इस घटना के पश्चात वे अपने परिवार का भार अपने श्वसुर मूला को सौंपकर विचरण करने निकल पड़े और धर्म का प्रचार करने लगे.


Guru Nanakगुरु जी ने इन उपदेशों को अपने जीवन में अमल में लाकर स्वयं एक आदर्श बन सामाजिक सद्भाव की मिसाल कायम की. उन्होंने लंगर की परंपरा चलाई, जहां अछूत लोग, जिनके सामीप्य से उच्च जाति के लोग बचने की कोशिश करते थे, ऊंची जाति वालों के साथ बैठकर एक पंक्ति में बैठकर भोजन करते थे. आज भी सभी गुरुद्वारों में गुरु जी द्वारा शुरू की गई यह लंगर परंपरा कायम है. लंगर में बिना किसी भेदभाव के संगत सेवा करती है.


इस जातिगत वैमनस्य को खत्म करने के लिए गुरू जी ने संगत परंपरा शुरू की. जहां हर जाति के लोग साथ-साथ जुटते थे, प्रभु आराधना किया करते थे. गुरु जी ने अपनी यात्राओं के दौरान हर उस व्यक्ति का आतिथ्य स्वीकार किया, उसके यहां भोजन किया, जो भी उनका प्रेमपूर्वक स्वागत करता था. कथित निम्न जाति के समझे जाने वाले मरदाना को उन्होंने एक अभिन्न अंश की तरह हमेशा अपने साथ रखा और उसे भाई कहकर संबोधित किया. इस प्रकार तत्कालीन सामाजिक परिवेश में गुरु जी ने इन क्रांतिकारी कदमों से एक ऐसे भाईचारे को नींव रखी जिसके लिए धर्म-जाति का भेदभाव बेमानी था.


जीवन भर देश विदेश की यात्रा करने के बाद गुरु नानक अपने जीवन के अंतिम चरण में अपने परिवार के साथ करतापुर बस गए थे. गुरु नानक ने 25 सितंबर, 1539 को अपना शरीर त्यागा. जनश्रुति है कि नानक के निधन के बाद उनकी अस्थियों की जगह मात्र फूल मिले थे. इन फूलों का हिन्दू और मुसलमान अनुयायियों ने अपनी अपनी धार्मिक परंपराओं के अनुसार अंतिम संस्कार किया.


गुरुनानक देव जी की दस शिक्षाएं
1. ईश्वर एक है.
2. सदैव एक ही ईश्वर की उपासना करो.
3. ईश्वर सब जगह और प्राणी मात्र में मौजूद है.
4. ईश्वर की भक्ति करने वालों को किसी का भय नहीं रहता.
5. ईमानदारी से और मेहनत कर के उदरपूर्ति करनी चाहिए.
6. बुरा कार्य करने के बारे में न सोचें और न किसी को सताएं.
7. सदैव प्रसन्न रहना चाहिए. ईश्वर से सदा अपने लिए क्षमा मांगनी चाहिए.
8. मेहनत और ईमानदारी की कमाई में से ज़रूरतमंद को भी कुछ देना चाहिए.
9. सभी स्त्री और पुरुष बराबर हैं.
10. भोजन शरीर को ज़िंदा रखने के लिए जरूरी है पर लोभ-लालच व संग्रहवृत्ति बुरी है.




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6 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

Paoo के द्वारा
February 14, 2016

The answer of an exeptr. Good to hear from you.

Dr.Mrs. R.K. Patheja के द्वारा
November 5, 2014

Teachings of Sri Guru Nanak Dev ji Tommorrow is the 545th Birth anniversary of the most simple, humble saint and a true reformer of humanity ,Sri Guru Nanak Devji.Though he was born about five and half centuries ago, his thinking, concepts and principles related to life and living were far ahead of its time and they have relevance in todays time and are contemporary even today. He believed in one God and strongly protested against blind faith and rituals. Basic Principles of the first Guru of Sikhs, Which he not only preached but lived his own life along these principles are 1.TRUISM :he says :”sabhe ooper sach hai,opper sach aachar” which means Truth is highest, but truthful living is higher still. 2.EQUALITY : Manas ki jaat sabhai ekai pahchanabo,which means We should treat all human being as one at equal level without bothering about the caste, creed and colour.he himself had two of his disciples and companions Bala and Mardana, one of them was ahindu and the other one was a muslim. UNIVERSAL BROTHERHOOD: He says :Ek pita ,Ekas ke hum Barik. which means we are children of one father ,so we all are brothers. WOMEN EMPOWERMENT : He said “so kiyun manda akhiye jit jamme rajan” which means why criticise and belittle women , who gives birth to Kings and all humanbeing. MEDITATION : Naam Japo. CORPORATE SOCIAL RESPONSIBITY : Kirat karo and Vand Chhako , where he says work diligently without harming anyone and give a part of 10% of your earning in charity. All the above mentioned Principles which corporates and the world over started shouting from 19th century onwards in loud voice like womens liberation ,womens rights and universall brothr=erhood for peace by certain philosophers and scholars, CSR by well established fianancial houses are the names given in todays world to those simple principles preached by Gur Nanak Dev ji . These principles are the need of the hour, in present scenario if we all follow these principles then there would be no war, no fight ,no animousity and no hatred amongst us and we all can lead the life of peace,love n sanctity and our beautifoul planet earth would become a paradise of love.

Amandeep singh के द्वारा
November 15, 2013

waheguru waheguru dhan guru nanak

Kulvinder singh saini के द्वारा
November 8, 2012

God you are great.i love you .i belive it ……

Parvinder के द्वारा
September 22, 2011

Guru Nanak Dev Ji ne hi Ham sikho ko banaya hai. Unki Sat sat naman ,,, VAHE GURU KI JAYe..


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