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पं. श्रीराम शर्मा आचार्य

Posted On: 13 Jun, 2011 Others में

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इतिहास में ऐसे लोग बहुत कम होते हैं जो खुद सही रास्ते पर चलने के साथ अपने साथ दूसरों को भी सही रास्ते पर चलाने का दम रखते हैं. ऐसे ही एक महापुरुष थे पं. श्रीराम शर्मा आचार्य. पं. श्रीराम शर्मा आचार्य(Pandit Shriram Sharma Acharya) भारत के एक युगदृष्टा मनीषी थे जिन्होने अखिल भारतीय गायत्री परिवार(All World Gayatri Pariwar) की स्थापना की. अपना सारा जीवन श्रीराम शर्मा ने समाज के कल्याण के लिए समर्पित कर दिया. आधुनिक और प्राचीन विज्ञान के साथ तालमेल बनाकर उन्होंने विकास का रास्ता निकाला. उनका व्यक्तित्व एक साधु पुरुष, आध्यात्म विज्ञानी, योगी, दार्शनिक, मनोवैज्ञानिक, लेखक, सुधारक, मनीषी व दृष्टा का समन्वित रूप था.


Pt. Shriram Sharmaपण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य का जन्म 20 सितम्बर,1911 को उत्तर प्रदेश(Uttar Pradesh) के आगरा जनपद के आँवलखेड़ा ग्राम में हुआ था. उनका बचपन ग्रामीण परिसर में ही बीता. प. श्रीराम का जन्म तो एक जमींदार घराने में हुआ था लेकिन उनका जीवन बिलकुल सादा था. उनके पिता श्री पं.रूपकिशोर शर्मा जी(Pt. Roopkishore Sharma)एक प्रसिद्ध पंडित थे लेकिन किन्तु उनका अंतःकरण मानव मात्र की पीड़ा से सतत् विचलित रहता था. साधना के प्रति उनका झुकाव बचपन में ही दिखाई देने लगा, जब वे अपने सहपाठियों को, छोटे बच्चों को अमराइयों में बिठाकर स्कूली शिक्षा के साथ-साथ सुसंस्कारिता अपनाने वाली आत्मविद्या का शिक्षण दिया करते थे .


पंद्रह वर्ष की आयु में वसंत पंचमी की वेला में सन् 1926 में उनके घर की पूजास्थली में, जो उनकी नियमित उपासना का तब से आधार थी, जबसे महामना पं.मदनमोहन मालवीय(Mahamana Madan Mohan Malaviya,) जी ने उन्हें काशी में गायत्री मंत्र(Gayatri Mantra) की दीक्षा दी थी, उनकी गुरुसत्ता का आगमन हुआ था.


लेकिन राष्ट्र के परावलम्बी होने की पीड़ा भी उन्हें उतनी ही सताती थी जितनी कि गुरुसत्ता के आदेशानुसार तपकर सिद्धियों के उपार्जन की ललक उनके मन में थी. उनके इस असमंजस को गुरुसत्ता ने ताड़कर स्वतंत्रता संग्राम सेनानी के नाते संघर्ष करने का भी संकेत था. 1927 से 1933 तक का उनका समय एक सक्रिय स्वयं सेवक व स्वतंत्रता सेनानी के रूप में बीता. घरवालों के विरोध के बावजूद पैदल लम्बा रास्ता पार कर वे आगरा के उस शिविर में पहुंचे, जहां शिक्षण दिया जा रहा था. मित्रों के साथ भूमिगत हो कार्य करते रहे तथा समय आने पर जेल भी गये. उन्हें कई बार जेल हुई. जेल में भी वह निरक्षर साथियों को शिक्षण देकर व स्वयं अंग्रेजी सीखकर लौटे. स्वतंत्रता की लड़ाई के दौरान कुछ उग्र दौर भी आए, जिनमें शहीद भगतसिंह को फांसी दिये जाने पर फैले जन आक्रोश के समय उन्होंने भी जमकर इसका विरोध दर्ज कराया. नमक आन्दोलन के दौरान वे आततायी शासकों के समक्ष झुके नहीं, आन्दोलन के दौरान फिरंगी उन्हें पीटते रहे, झण्डा छीनने का प्रयास करते रहे लेकिन उन्होंने झण्डा नहीं छोड़ा. उन्होंने मुंह से झण्डा पकड़ लिया, गिर पड़े, बेहोश हो गए लेकिन झण्डा नहीं छोड़ा. उनकी सहनशक्ति देखकर सब आश्चर्यचकित रह गए. उन्हें तब से ही आजादी के मतवाले उन्मत्त श्रीराम मत्त नाम मिला. अभी भी आगरा में उनके साथ रहे व्यक्ति उन्हें मत्त जी नाम से ही जानते हैं. स्वतंत्रता सेनानी के तौर पर मिलने वाली पेंशन को भी उन्होंने प्रधानमंत्री राहत फण्ड को समर्पित कर दिया.


1935 के बाद उनके जीवन का नया दौर शुरू हुआ, जब गुरुसत्ता की प्रेरणा से वे श्री अरविन्द से मिलने पाण्डिचेरी, गुरुदेव रवीन्द्रनाथ टैगौर से मिलने शांति निकेतन तथा बापू से मिलने साबरमती आश्रम, अहमदाबाद गए. सांस्कृतिक, आध्यात्मिक मंचों पर राष्ट्र को कैसे परतंत्रता की बेड़ियों से मुक्त किया जाए, यह र्निदेश लेकर अपना अनुष्ठान यथावत् चलाते हुए उन्होंने पत्रकारिता के क्षेत्र में प्रवेश किया. आगरा में सैनिक समाचार पत्र के कार्यवाहक संपादक के रूप में श्रीकृष्णदत्त पालीवाल जी ने उन्हें अपना सहायक बनाया. बाबू गुलाब राय व पालीवाल जी से सीख लेते हुए उन्होंने “अखण्ड ज्योति” नामक पत्रिका का पहला अंक 1938 की वसंत पंचमी पर प्रकाशित किया. हाथ से बने कागज पर पैर से चलने वाली मशीन से छापकर अखण्ड ज्योति पत्रिका का शुभारंभ किया, जो पहले तो दो सौ पचास पत्रिका के रूप में निकली, किन्तु आज दस लाख से भी अधिक संख्या में विभिन्न भाषाओं में छपती व करोड़ से अधिक व्यक्तियों द्वारा पढ़ी जाती है.


आसनसोल जेल(Asansol jail) में वे पं.जवाहरलाल नेहरू की माता श्रीमती स्वरूपरानी नेहरू(Swaruparani Nehru), श्री रफी अहमद किदवई, मदनमोहन मालवीय जी(Mahamana Madan Mohan Malaviya) जैसी हस्तियों के साथ रहे और वहां उन्होंने एक मूलमंत्र सीखा जो मालवीय जी ने दिया था कि जन-जन की साझेदारी बढ़ाने के लिए हर व्यक्ति के अंशदान से, मुट्ठी फण्ड से रचनात्मक प्रवृत्तियां चलाना. यही मंत्र आगे चलकर एक घंटा समयदान, बीस पैसा नित्य या एक दिन की आय एक माह में तथा एक मुट्ठी अन्न रोज डालने के माध्यम से लाखों-करोड़ों की भागीदारी वाला गायत्री परिवार बनता चला गया, जिसका आधार था – प्रत्येक व्यक्ति की यज्ञीय भावना का उसमें समावेश. गायत्री परिवार आज विश्व भर में गायत्री मंत्र की शक्ति का प्रचार-प्रसार कर रहा है.


परम पूज्य गुरुदेव पं.श्रीराम शर्मा आचार्य को एक ऐसी ही सत्ता के रूप में देखा जा सकता है, जो युगों-युगों में गुरु एवं अवतारी सत्ता दोनों ही रूपों में हम सबके बीच प्रकट हुई. गुरु जी की आत्मा 2 जून, 1990 को शरीर त्याग कर परमात्मा में विलीन हो गयी.




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nandlal lallan ram के द्वारा
June 12, 2014

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