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भगवान परशुराम जयंती की धूम - Parshuram Jayanti

Posted On: 5 May, 2011 Others में

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आज भगवान परशुराम की जयंती है. भगवान परशुराम को उनके हठी स्वभाव, क्रोध और अन्याय के खिलाफ आवाज उठाने के लिए याद किया जाता है. भगवान परशुराम हमारे सामने इस बात के साक्षात उदाहरण हैं कि क्रोध इंसान को बर्बाद कर सकती है, लेकिन अगर हम अपने क्रोध और अन्य इंद्रियों पर काबू पा लें तो हम भी महानतम लोगों की श्रेणी में आ सकते हैं.


Sri Parashuramभगवान विष्णु के पांचवें अवतार भगवान परशुराम ने अपने जीवन के लिए अपने ही नियम बना रखे थे.

अक्षय तृतीया के पुण्य दिवस पर ही भगवान परशुराम अवतरित हुए. इस दिन उनके चरित्र का स्मरण और अनुसरण कर कोई भी व्यक्ति अपने जीवन में सफलता की ऊंचाइयों को प्राप्त कर सकता है.


भगवान परशुराम क्रोधी होने के साथ साथ अत्यंत समझदार, कल्याणकारी और धर्मरक्षक थे. इस विषय में एक घटना बेहद लोकप्रिय है जो कुछ इस प्रकार से है: भगवान परशुराम के पिता भृगुवंशी ऋषि जमदग्नि और माता राजा प्रसेनजित की पुत्री रेणुका थीं. ऋषि जमदग्नि बहुत तपस्वी और ओजस्वी थे. ऋषि जमदग्नि और रेणुका के पांच पुत्र रुक्मवान, सुखेण, वसु, विश्ववानस और परशुराम हुए. एक बार रेणुका स्नान के लिए नदी किनारे गईं. संयोग से वहीं पर राजा चित्ररथ भी स्नान करने आया था, राजा चित्ररथ सुंदर और आकर्षक था. राजा को देखकर रेणुका भी आसक्त हो गईं. किंतु ऋषि जमदग्नि ने अपने योगबल से अपनी पत्नी के इस आचरण को जान लिया. उन्होंने आवेशित होकर अपने पुत्रों को अपनी मां का सिर काटने का आदेश दिया. किंतु परशुराम को छोड़कर सभी पुत्रों ने मां के स्नेह के बंधकर वध करने से इंकार कर दिया, लेकिन परशुराम ने पिता के आदेश पर अपनी मां का सिर काटकर अलग कर दिया.


क्रोधित ऋषि जमदग्नि ने आज्ञा का पालन न करने पर परशुराम को छोड़कर सभी पुत्रों को चेतनाशून्य हो जाने का शाप दे दिया. वहीं परशुराम को खुश होकर वर मांगने को कहा. तब परशुराम ने पूर्ण बुद्धिमत्ता के साथ वर मांगा. जिसमें उन्होंने तीन वरदान मांगे – पहला, अपनी माता को फिर से जीवन देने और माता को मृत्यु की पूरी घटना याद न रहने का वर मांगा. दूसरा, अपने चारों चेतनाशून्य भाइयों की चेतना फिर से लौटाने का वरदान मांगा. तीसरा वरदान स्वयं के लिए मांगा जिसके अनुसार उनकी किसी भी शत्रु से या युद्ध में पराजय न हो और उनको लंबी आयु प्राप्त हो.


इस तरह अपनी बुद्धिमता से परशुराम ने अपनी माता को भी जीवित कर लिया, पिता की आज्ञा का पालन भी किया और अपने भाइयों का भी साथ दिया.


इस घटना के कुछ समय बाद ही एक दिन जमदग्नि ऋषि के आश्रम में कार्त्तवीर्य अर्जुन आए. जमदग्नि मुनि ने कामधेनु गौ की सहायता से कार्त्तवीर्य अर्जुन का बहुत आदर सत्कार किया. कामधेनु गौ की विशेषताएं देखकर कार्त्तवीर्य अर्जुन ने जमदग्नि से कामधेनु गौ की मांग की किन्तु जमदग्नि ने उन्हें कामधेनु गौ को देना स्वीकार नहीं किया. इस पर कार्त्तवीर्य अर्जुन ने क्रोध में आकर जमदग्नि ऋषि का वध कर दिया और कामधेनु गौ को अपने साथ ले जाने लगा. किन्तु कामधेनु गौ तत्काल कार्त्तवीर्य अर्जुन के हाथ से छूट कर स्वर्ग चली गई और कार्त्तवीर्य अर्जुन को बिना कामधेनु गौ के वापस लौटना पड़ा. जब यह घटना हुई उस समय परशुराम वहां मौजूद नहीं थे. जब परशुराम वहां आए तो उनकी माता छाती पीट-पीट कर विलाप कर रही थीं. अपने पिता के आश्रम की दुर्दशा देखकर और अपनी माता के दुःख भरे विलाप सुन कर परशुराम जी ने इस पृथ्वी पर से क्षत्रियों के संहार करने की शपथ ले ली. पिता का अन्तिम संस्कार करने के पश्‍चात परशुराम ने कार्त्तवीर्य अर्जुन से युद्ध करके उसका वध कर दिया. इसके बाद उन्होंने इस पृथ्वी को इक्कीस बार क्षत्रियों से रहित कर दिया और उनके रक्‍त से समन्तपंचक क्षेत्र में पांच सरोवर भर दिए. अन्त में महर्षि ऋचीक ने प्रकट होकर परशुराम को ऐसा घोर कृत्य करने से रोक दिया.


परशुराम के बचपन का नाम राम था, उनके नाम के साथ भी एक पौराणिक कहानी जुड़ी हुई है जो कुछ इस प्रकार से है. एक दिन गणेश भगवान पृथ्वी पर भ्रमण कर रहे थे और किसी बात पर उनका राम से साथ झगड़ा हो गया. राम ने गणेश को धरती पर पटक दिया जिससे गणेश का एक दांत टूट गया और राम ने गणेश से उनका प्रिय अस्त्र “परशु” छीन लिया. जब यह बात भगवान शिव को पता चली तो उन्होंने राम को “परशुराम” का नाम दे दिया.


भगवान परशुराम जी शास्त्र एवम् शस्त्र विद्या के पूर्ण ज्ञाता हैं. प्राणी मात्र का हित ही उनका सर्वोपरि लक्ष्य होता है. भगवान शिव, परशुराम जी के गुरू हैं. वह तेजस्वी, ओजस्वी, वर्चस्वी महापुरूष हैं. न्याय के पक्षधर होने के कारण भगवान परशुराम जी बाल अवस्था से ही अन्याय का निरन्तर विरोध करते रहे. उन्होंने दीन-दुखियों, शोषितों और पीड़ितों की निरंतर सहायता एवम् रक्षा की है.




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Luckie के द्वारा
June 11, 2016

The people must understand that freedoms are won, through much effort and sacrifice.They are then kept, via a tireless vigilance and continuing effort, coupled with holding elected officials ac;aontuble&#8230c…..There is NO autopilot effort that will ever ensure that freedoms remain intact. People are the purveyors who must continue the fight.

akhand के द्वारा
August 16, 2013

भगवान परसुराम सभी क्षत्रिया का नास किये लेकिन राम जी को के बांस का नास क्यों नहीं किये PLZ RESPONSE ME ON MY MAIL ID akhandextra@gmail.com


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