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व्रत-त्यौहार, सितारों के जन्म दिन, राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय महत्व के घोषित दिनों पर आधारित ब्लॉग

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भूखे-नंगे और फटेहाल पिछड़ों का देश

पोस्टेड ओन: 26 Jul, 2010  में


कॉमनवेल्थ गेम्स के चलते दिल्ली से गरीबी खत्म हो रही है, नरेगा से गरीब बेरोजगारों को रोजगार दे उनकी गरीबी दूर की जा रही है, शिक्षा का अधिकार से शिक्षा बांट के गरीबी हटाई जा रही है….रुकिए आगे कुछ भी पढ़ने से पहले यूएनडीपी की ताजा रिपोर्ट पढ़ लीजिए जिसके अनुसार भारत के आठ जिलों की गरीबी अफ्रीका के 26 सबसे गरीब देश से भी ज्यादा है. हालांकि भारत गरीबी में पहले भी काफी आगे था लेकिन विकास के इस तेजी के दौर में अब वह और भी तेजी से गरीब होता जा रहा है.

malinbastiयूएनडीपी के सहयोग से आक्सफोर्ड पावर्टी और मानव विकास पहल द्वारा विकसित किए गए मल्टीडायमेंशनल पावर्टी इंडेक्स (एमपीआई) से गरीबी का यह आकलन किया गया है. एमपीआई के जरिए किए गए विश्लेषण के मुताबिक उत्तर प्रदेश, बिहार, छत्तीसगढ़, झारखंड, मध्य प्रदेश, उड़ीसा, राजस्थान और पश्चिम बंगाल में 42.1 करोड़ लोग गरीबी की मार से त्रस्त हैं, जबकि 26 निर्धन अफ्रीकी देशों में गरीब लोगों की संख्या 41 करोड़ है.

आजादी के 62 सालों के बाद भारत के पास दुनियां की दूसरी सबसे तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था का दावा है. मगर, यह भी सच है कि अमेरिका की कुल आबादी से कहीं अधिक भूख और कुपोषण से घिरे पीड़ितों का आकड़ा भी यहीं पर है. सरकार, योजना आयोग, वित्त आयोग सब हर तरफ इस एक चीज को छुपाने में लगे हैं कि भारत में गरीब और भयावह गरीबी है ही नहीं लेकिन वास्तविकता कभी छुपती है भला.

19144ऐसा नहीं है कि गरीबी एकमात्र ऐसा क्षेत्र है जिसमें सरकार विफल रही है बल्कि सरकार देश के हर बड़े मसले पर विफल होती नजर आई है चाहे वह महंगाई हो या भ्रष्टाचार या ऑनर किलिंग. सरकारी महकमे के नकारापन का नतीजा है कि मनरेगा और अन्य योजनाओं के बावजूद भारत में गरीबों की संख्या बढ़ी है.

ऐसा नहीं है कि सरकार में दूरदर्शिता की कमी है या सरकार के पास उपाय नहीं है. सरकार ने मनरेगा और शिक्षा के कानून को लागू कर साफ कर दिया कि उसके पास हर मर्ज की दवा है लेकिन जब उस दवा के वितरण की बात आई तो सरकारी महकमे में ही धांधली दिखी. बात करते हैं कुछ विशेष कार्यक्रमों और उनकी विफलता की जिससे साफ हो जाएगा की खोट सरकारी नीतियों में नहीं बल्कि उनको लागू करने में है.

नरेगा की विफलता : ग्रामीण विकास मंत्रालय द्वारा कार्यान्वित राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम(नरेगा) 2005 सरकार का एक प्रमुख कार्यक्रम बना. विश्वास जताया गया कि यह गरीबों की जिंदगी से सीधे तौर पर जुड़ा है. इसके तहत हर घर के एक वयस्क सदस्य को एक वित्त वर्ष में कम से कम 100 दिनों का रोजगार दिए जाने की गारंटी दी गई.

इस समय इसको लागू किए हुए पूरे चार साल हो चुके हैं किंतु आप सच जानकर ताज्जुब करेंगे कि मजदूरों का पलायन बदस्तूर जारी है. यदि काम मिल भी गया तो लोगों को 6 से 8 माह तक मजदूरी नहीं मिली है. न ही मजदूरों को बेरोजगारी भत्ता मिल रहा है और न ही अन्य हकदारियां. इस नजरिए से यह जनता के हितों को संरक्षित करने वाला कानून तो नहीं ही है.

पहले जिस ग्राम-पंचायत को लोग पंचों की आवाज मानते थे अब वह भ्रष्टाचार की गिरफ्त में आ गया है. प. बंगाल हो या बिहार, उडीसा या आंध्रप्रदेश सब जगह सरकार की नरेगा ने दम तोड़ दिया.

हर हाथ को मिले काम, काम का मिले पूरा दाम, इस शीर्षक के साथ सरकार की सारी मंशा धरी की धरी रह गई. नरेगा में भ्रष्टाचार के पीछे स्थानीय निकाय चुनाव अहम कारण बने हुए हैं.

99f9bca8-7098-11de-bf42-000b5dabf636जन वितरण प्रणाली:  एक गरीब के लिए राशन की सहकारी दुकान किसी भगवान के भंडार से कम नहीं होती जहां वह अपने घर का पेट पालने के लिए खाद्य वस्तुएं जुटाता है. इस बात को ध्यान में रखकर सरकार ने पी.डी.एस का गठन किया.  खाद्य सुरक्षा का प्रावधान करने में जन वितरण प्रणाली(पी.डी.एस) महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है . भारतीय जन वितरण प्रणाली(पी.डी.एस) शायद अपने आप में पूरी दुनिया में इस प्रकार की सबसे बड़ी वितरण प्रणाली है.

लेकिन एक जमीनी सच यह भी है कि पी.डी.एस में जितनी धांधली होती है शायद ही उतनी किसी और सरकारी विभाग में होती है. गरीबी घटेगी कैसे जब गरीबों का अनाज अमीरों को ऊंचे दामों पर दे दिया जाता है.

शिक्षा का अधिकार कानून हुआ फेल: पप्पुओं को पढाने के लिए सरकार ने शिक्षा का अधिकार लागू किया. अभी इस कानून को लागू करने का आदेश दिया ही गया कि देश के सबसे बडे राज्य उत्तर प्रदेश की मुख्यंमंत्री साहिबा ने कह दिया कि प्रदेश के पास इस बिल को लागू करने के लिए धन नही है. अब यह बिल कैसे जनता की महंगाई खत्म करेगा यह तो सरकार जाने.

उपरोक्त तो मात्र कुछ उदाहरण थे ऐसे कई मामले हैं जिनमें सरकार और उसकी नितियों की धज्जियां उड़ती नजर आई हैं.  इस समय सरकार में भ्रष्टाचार बडे पैमाने पर फैला हुआ है.

निम्न कुछ विशेष कारण हैं जिनको आप सरकार की असफलता का दोषी मान सकते हैं.

अपराधियों-राजनेताओं-नौकरशाहों और व्यापारियों का दूषित गठबंधन सबसे बड़ा और महत्वपूर्ण कारण है जिसके कारण कोई भी व्यवस्था सफल नहीं हो पा रही है.

इसके अलावे सरकारी कामकाज में पारदर्शिता की कमी, सरकारी कर्मचारियों का निकम्मापन, सरकार में आंतरिक एकजुटता की कमी, केन्द्र और राज्य सरकार के ढुलमुल तरीके भी ऐसी अराजकताओं के लिए जिम्मेदार हैं.

INDIA POLITICSलेकिन जिस वजह से गरीबी सबसे ज्यादा बढ़ी है वह है सरकार की असमानता की नीति. मनमोहन सिंह जिस अर्थशास्त्र को लगा कर जीवनस्तर सुधारने की बात करते हैं वह दरअसल गरीबों को और गरीब करने के साथ अमीरों को और अमीर बना रही है. और इसके बीच में जो मध्यम वर्गीय समाज है वह भी गरीबी की चपेट में आ रहा है. सरकारी नीतियां बाजारवाद की भेंट चढ़ती नजर आई हैं.

विश्व और बाजार को अगर साथ लेकर चला गया तो साफ है कि महंगाई और गरीबी इसी तरह बढ़ती रहेगी. बदबू आने पर शरीर पर खुशबू छिड़क लेने से बदबू खत्म नहीं हो जाती. हम अपनी गरीबी को चाहे जितना छुपा लें लेकिन वास्विकता  यूएनडीपी की रिपोर्ट ने जाहिर कर ही दी.

क्या सरकार आने वाले दिनों में महंगाई को और हवा देगी या समय रहते संभलेगी?

क्या भारत में अब सांस लेने पर भी आम आदमी को टैक्स देना पड़ेगा?

आपके विचार में सरकार से कहां चूक हो रही है?

आप किस सरकारी नीति को गलत मानते है?

यह सब सरकार के हाथ में है. सही रणनीति और बेहतर कमान भारत को एक बार फिर सोने की चिडिया बना सकती है. महगांई और गरीबी के खिलाफ अपनी आवाज उठाइए ताकि आने वाले समय में महंगाई और गरीबी के भूत से छुटकारा मिल सके.



Tags: Social Issue  नरेगा  NAREGA  commonwealth games  कोमंन वेल्थ गेम्स  UNDP  poverty in India  भारत में गरीबी  Right of Education  शिक्षा का अधिकार  सामाजिक  PDS  पी डे एस  

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