blogid : 3738 postid : 31

किसे मिलना चाहिए मानवाधिकार

Posted On: 10 Dec, 2010 Others में

  • SocialTwist Tell-a-Friend


मानवाधिकार मतलब किसी भी इंसान की जिंदगी, आजादी, बराबरी और सम्मान का अधिकार. आज 10 दिसम्बर को पूरा विश्व मानवाधिकार दिवस के रुप में मना रहा है. मानवाधिकार एक ऐसा विषय है जिस पर हमेशा से ही बहस रही है. बहस इस बात पर कि इंसान को इंसान की तरह जीने देना और साथ ही क्या इंसान की शक्ल में जो हैवान है उनका भी मानवाधिकार होना चाहिए?

human rights जहां एक तरफ ग्वांतानामो जेल, अबू गरीब जेल जैसे कांड हृदय में मानवाधिकारों की दुहाई देते हैं वहीं जब अबु सलेम, अफजल गुरु जैसे हत्यारे और आतंकियों के मानवाधिकार की बात की जाती है तो यह निरर्थक लगती है. यहां विरोधाभास तो है ही लेकिन कहीं न कहीं मानव का हित साधना ही परम उद्देश्य है. हम सभी चाहते हैं कि बेशक कोई दोषी न सजा पा सके लेकिन किसी निर्दोष को भी तो बलि का बकरा न बनाया जाए.

मानवाधिकार दिवस की शुरुआत संयुक्त राष्ट्र महासभा ने 1948 में की थी. उसने 1948 में सार्वभौमिक मानवाधिकार घोषणा स्वीकार की थी और 1950 से महासभा ने सभी देशों को इसकी शुरुआत के लिए आमंत्रित किया था. संयुक्त राष्ट्र ने इस दिन को मानवाधिकारों की रक्षा और उसे बढ़ावा देने के लिए तय किया. लेकिन हमारे देश में मानवाधिकार कानून को अमल में लाने के लिए काफी लंबा समय लग गया. भारत में 26 सिंतबर 1993 से मानव अधिकार कानून अमल में लाया गया है.

guantanamo_bayलेकिन ऐसा नहीं है कि भारत में ही स्थिति खराब है. आज इतने लंबे समय बाद भी विश्व स्तर पर और खासकर अमेरिका मानवाधिकारों का हनन करने में सबसे आगे है. वैसे तो दुनियाभर में किसी भी देश के कानून में यातना की इजाजत नहीं दी गई है, लेकिन फिर भी इसका धड़ल्ले से इस्तेमाल हो रहा है. संयुक्त राष्ट्र में लोगों या कैदियों को यातनाएं दिए जाने के विरोध में बहुत से प्रस्ताव और कानून पारित होने के बावजूद आज भी दुनियाभर के तमाम देश इस बुराई का इस्तेमाल कर रहे हैं. कहीं अपराधियों से सच उगलवाने के नाम पर तो कहीं नागरिकों को नियंत्रण में रखने के नाम पर सरकारी एजेंसियां यातना का हथकंडा अपनाती हैं.

जब तक बात अपराधियों की है तब तक तो सब सही है क्योंकि एक बलात्कारी, आतंकवादी या हत्यारे का कोई मानवाधिकार तो होना ही नहीं चाहिए लेकिन इन्हीं अपराधियों के साये में जब कोई निर्दोष हत्थे चढ़ जाता है या प्रशासन सच उगलवाने के लिए गैरकानूनी रूप से किसी को शारीरिक या मानसिक यातना देता है तब समझ में आता है मानवाधिकार कितना जरुरी है.

मानवाधिकार एक ऐसा विषय है जो सभी सामाजिक विषयों में सबसे गंभीर है जिसे हम एक तरफा हो कर नहीं सोच सकते. पर अपने राजनीतिक या अन्य बुरे मंसूबों को सफल बनाने के लिए मानवाधिकारों का सहारा लेना बिलकुल गलत है.

| NEXT



Tags:         

Rate this Article:

1 Star2 Stars3 Stars4 Stars5 Stars (7 votes, average: 3.14 out of 5)
Loading ... Loading ...

5 प्रतिक्रिया

  • SocialTwist Tell-a-Friend

Post a Comment

CAPTCHA Image
*

Reset

नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

suryashankar के द्वारा
December 21, 2010

zxcdmsadmfxasdsD / xz/d sq/d/

munna के द्वारा
December 12, 2010

Mananiya har cheej ke do pahau hotey hai, sakaratmak avam vinashatmak, achchhaee avam buraee aur aisey hi manav avam danav. manavadhikar manav ke liye hona chhiye danavo key nahi parantu sachchaee yaha hai 90% manavadhikar ka upyog danav log kar rahey hai ya phir kahiye kuchha dusta neta ya rajnetic party manavadhikar ka upyog danavo ke kiye kararahi hai swatantra bharat ki nyayapalika bharaki janta ke liye honi chahiya na ki atankwadio ke liye wah re bhartiya sambhidhan aur sambhihan key rakhwale ye sab desh ko patal mai le jane wala hai. sansad par hamala karaney ko saja dene ke liye bhi saboot chihiye taj hotal ke atankwadi ko saja honey ke babjood bhi hamdardi. kanha gaya sambhidan 1192 mai jo bhool prathvi raj ne ki thi wahi bhoole aaj ke neta prathvi raj karrahe hai 1192 mai manavadhikar ki vajah say hi bharat gulam hua wahi punaravrati ki taiyarii ho rahi hai bharat mata ki jai

nishamittal के द्वारा
December 12, 2010

गलत छपने वाले शब्द को बिहाफ पढ़ा जाए.

nishamittal के द्वारा
December 12, 2010

मानवाधिकार एक बेहद संवेदनशील विषय है.यदि पोलिस या अधिकारी उसके साथ न्याय नहीं कर पा रहे हैं तो ये उनके बेहल्फ़ पर अपराध है.देखा ये जा रहा है यथार्थ में बड़े अपराधी आतंकवादी इसकी आड़ में अपने को बचा लेते हैं.अतः आवश्यकता सही क्रियान्वयन की है.

Amit-Tohana के द्वारा
December 10, 2010

जब तक भारत में भ्रष्टाचार व्याप्त है , कानून व्यवस्था अपराधो में लिप्त है तब तक मानवाधिकार की बात करना बेमानी होगा . दबंग लोग सरेआम लोगो का घर जला देते हैं, मिर्च्पुर हरियाणा जैसी घटनाये बार बार दोहराई जाती हैं , आतंकवादियों को दामाद बनाकर रखा जाता है और बेकसूरों को फांसी पर लटका दिया जाता है . आम आदमी की गाढ़ी कमाई को 2 – 3 लोग खा जाते है और डकार तक नहीं लेते , ऐसे समाज में मानवाधिकारों की बात करना जले पर नमक लगाना है .


topic of the week



अन्य ब्लॉग

latest from jagran